रायपुर 4 जुलाई 2026। राजधानी रायपुर के ग्राम नकटी में शासकीय चारागाह भूमि पर हुए भारी अतिक्रमण और उसके बाद प्रशासन के बुलडोज़र एक्शन ने पूरे प्रदेश में हलचल मचा दी है। लेकिन अब इस विवाद से जुड़े जो सरकारी दस्तावेज और फाइलें सामने आई हैं, उन्होंने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दस्तावेजों से साफ है कि जिस महा-अतिक्रमण को आज हटाया जा रहा है, उसकी नींव सालों पहले ही पड़ चुकी थी और अफसरों की ‘रहस्यमयी खामोशी’ के कारण यह अवैध कब्जा 1 साल में 5 गुना फैल गया।
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2020 में बनी थी योजना
दस्तावेजों के मुताबिक, इस पूरी कहानी की शुरुआत 1 सितंबर 2020 को तत्कालीन कांग्रेस सरकार के दौरान हुई थी। छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल (CG Housing Board) ने ग्राम नकटी के खसरा क्रमांक 420 की 15.479 हेक्टेयर शासकीय भूमि पर एक सामान्य आवासीय योजना विकसित करने का प्रस्ताव रायपुर कलेक्टर को भेजा था। इसके बाद बकायदा सार्वजनिक इश्तिहार जारी कर संबंधित विभागों से आपत्तियां भी मांगी गई थीं।
अजीबो-गरीब चुप्पी: किसी विभाग को नहीं थी आपत्ति
जनवरी 2021 में स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य संबंधित सरकारी विभागों से इस प्रस्तावित भूमि को लेकर राय मांगी गई थी। हैरानी की बात यह है कि किसी भी सरकारी विभाग ने इस कीमती चारागाह भूमि को आवासीय योजना में बदलने पर कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई।
2021 से 2023: सिर्फ 24 महीनों में ‘खेल’ हो गया!
सरकारी सर्वे रिपोर्ट इस बात का सबूत हैं कि कैसे प्रशासनिक लापरवाही ने भू-माफियाओं और कब्जाधारियों के हौसले बुलंद किए:
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जून 2021 का सच: राजस्व सर्वे और हाउसिंग बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, उस वक्त सिर्फ 3 हेक्टेयर हिस्से में कुछ कच्चे मकान और बाड़ियां थीं।
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2022 की बड़ी लापरवाही: इसी साल चारागाह भूमि पर तेजी से बढ़ रहे अवैध निर्माण को लेकर जिला प्रशासन से लिखित शिकायत की गई थी। अधिकारियों से तुरंत एक्शन लेने की मांग की गई, लेकिन शिकायत को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
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2023 का महा-विस्फोट: प्रशासनिक सुस्ती का नतीजा यह हुआ कि महज एक साल के भीतर (2023 तक) अतिक्रमण 3 हेक्टेयर से बढ़कर 15 हेक्टेयर में फैल गया।
गरीबों की आड़ में रसूखदारों का खेल: 10,000 वर्गफीट के आलीशान बंगले
जांच दस्तावेजों में एक और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, इस सरकारी चारागाह भूमि पर सिर्फ गरीबों के झोपड़े नहीं, बल्कि 1,000 से लेकर 10,000 वर्गफीट से भी बड़े आलीशान मकान और पक्के निर्माण खड़े कर दिए गए। सर्वे में यह भी सामने आया कि अधिकांश कब्जाधारियों के पास पहले से ही अपने पैतृक गांवों या अन्य जगहों पर पक्के मकान मौजूद हैं। सिर्फ चंद परिवार ही ऐसे थे जो वाकई बेघर थे।
बड़ा सवाल: अब अफसरों की जवाबदेही कब तय होगी?
सरकारी फाइलों के सार्वजनिक होने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल प्रशासनिक जवाबदेही पर उठ रहा है। अगर साल 2022 में मिली लिखित शिकायत पर प्रशासन ने तुरंत कड़ा एक्शन लिया होता, तो आज 15 हेक्टेयर सरकारी जमीन पर कंक्रीट का जंगल खड़ा नहीं होता और न ही इतने बड़े पैमाने पर बेदखली की नौबत आती।
यह मामला अब सिर्फ अतिक्रमण हटाने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सरकारी तंत्र, भू-माफिया और रसूखदारों के उस गठजोड़ की ओर इशारा कर रहा है जिसने आंखें मूंदकर करोड़ों की सरकारी जमीन को लुटने दिया।








