Food Politics 15 Sep 2026 : नई दिल्ली में आयोजित BRICS समिट के गाला डिनर में मेहमानों को विशुद्ध शाकाहारी मेन्यू परोसा गया, जिसमें खांडवी, पनीर लबाबदार, गुच्छी मरमिक, मिलेट पुलाव, खुंब गलौटी और जलेबी जैसे व्यंजन शामिल थे। जहां एक तरफ केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि विदेशी मेहमानों ने भारतीय शाकाहारी व्यंजनों का भरपूर आनंद लिया, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया (X) पर एक नई बहस छेड़ दी। राहुल गांधी ने अपनी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा द्वारा बनाए गए छोले-भटूरे की तस्वीर साझा करते हुए लिखा कि ‘रिकॉर्ड के लिए, 80% भारतीय नॉनवेज खाते हैं और भारतीय नॉनवेज बेहद स्वादिष्ट होता है।’
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इस बहस को पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान बागेश्वर बाबा धीरेंद्र शास्त्री के नॉनवेज पर रोक लगाने वाले बयान ने और अधिक गरमा दिया। इन विरोधाभासी दावों और बयानों के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर भारत का असली खाना क्या है—शाकाहारी या मांसाहारी?
इतिहास क्या कहता है: क्या भारत कभी पूरी तरह शाकाहारी था?
इतिहास और पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि भारत में मांस खाने की परंपरा हजारों साल पुरानी है। ‘हिस्टोरिसिटी रिसर्च जर्नल’ की रिपोर्ट के अनुसार, सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में गाय, भेड़, कछुआ, मछली और मुर्गे की हड्डियां मिली हैं, जो यह साबित करती हैं कि उस दौर के लोग मांसाहारी भोजन करते थे।
वैदिक काल के संदर्भ में मार्क्सवादी इतिहासकार आर.एस. शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘India’s Ancient Past’ (1977) में उल्लेख किया है कि पशुपालन की प्रधानता के कारण वैदिक काल के आर्यों में गोमांस और अन्य मांस खाना प्रचलित था। मौर्या काल (321-185 ईसा पूर्व) के दौरान भी खरगोश, सांप और मेंढक जैसे जीवों को भोजन का हिस्सा बनाए जाने के उल्लेख मिलते हैं।
शाकाहार का उदय और मुगलों का प्रभाव
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, लॉस एंजिलिस (UCLA) की एक शोध अध्ययन के मुताबिक, भारत में शाकाहार का व्यापक प्रसार छठी शताब्दी ईसा पूर्व में बौद्ध और जैन धर्म के आगमन के बाद हुआ। महावीर और गौतम बुद्ध द्वारा दिए गए ‘अहिंसा’ के संदेश ने समाज को शाकाहार की ओर प्रेरित किया। हालांकि, भोजन के इतिहासकार पुष्पेश पंत के अनुसार, गौतम बुद्ध स्वयं भोजन के प्रति कोई पूर्वाग्रह नहीं रखते थे; वे कमंडल में जो भी भिक्षा मिलती थी, उसे स्वीकार कर लेते थे।
कालंतर में, 15वीं शताब्दी से इस्लामिक शासन और मुगलों के आगमन के साथ भारतीय रसोई में व्यापक बदलाव आए। फारसी और तुर्की तकनीकों का भारतीय मसालों के साथ मिश्रण कर कबाब, बिरयानी, कोरमा और निहारी जैसे व्यंजन तैयार किए गए। वहीं, पुर्तगालियों के आगमन से आलू और मटन के समोसे जैसी चीजों का समावेश हुआ।
आंकड़ों का सच: कितना सटीक है राहुल गांधी का 80% वाला दावा?
राहुल गांधी का 80% का आंकड़ा पूरी तरह काल्पनिक नहीं है, बल्कि यह सरकारी सर्वेक्षणों के काफी करीब है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019-2021) के आंकड़े बताते हैं कि 15 से 49 वर्ष की आयु वर्ग के 87% पुरुष और 75% महिलाएं मांस, मछली या अंडा खाते हैं। दोनों का औसत निकाला जाए तो यह आंकड़ा लगभग 80% बैठता है। 2006 में यह आंकड़ा 74% था, जो 2021 तक बढ़कर 80% हो गया।
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राज्यों की स्थिति: नागालैंड में सबसे अधिक 99.8% आबादी मांसाहारी है, जबकि राजस्थान में सबसे ज्यादा 71.17% लोग शाकाहारी हैं। भारत में केवल तीन राज्यों—पंजाब, हरियाणा और राजस्थान—में शाकाहारी आबादी बहुमत में है। केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे तटीय राज्यों में 95% से अधिक लोग मांसाहारी हैं।
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धार्मिक स्थिति: आंकड़ों के अनुसार, मुस्लिम (99%), ईसाई (99%) और बौद्ध (97%) आबादी का अधिकांश हिस्सा मांस का सेवन करता है। हिंदुओं में भी तीन-चौथाई (75% से अधिक) लोग मांसाहारी हैं, जबकि जैन समुदाय में शाकाहार का प्रतिशत सबसे अधिक है।
‘गैस्ट्रो-पॉलिटिक्स’ और शाकाहार की सामाजिक संरचना
सामाजिक वैज्ञानिकों और भीमराव आंबेडकर तथा गेल ओमवेट जैसे विद्वानों के अनुसार, शाकाहार को ऐतिहासिक रूप से जाति व्यवस्था और शुद्धता की अवधारणा से जोड़कर देखा गया। सांस्कृतिक सिद्धांतकार अर्जुन अप्पडुराई इसे ‘गैस्ट्रो-पॉलिटिक्स’ कहते हैं, जहां खान-पान सामाजिक नियंत्रण और शक्ति का जरिया बन जाता है।
आज भी यह प्रभाव रिहायशी सोसाइटियों, शैक्षणिक संस्थानों और दफ्तरों में शाकाहारी और नॉन-शाकाहारी खाने की अलग व्यवस्था के रूप में देखा जाता है। त्योहारों के दौरान मांस की बिक्री पर लगने वाले प्रतिबंध को कुछ विचारक बहुसंख्यकवादी सोच का हिस्सा मानते हैं, जो व्यक्तिगत प्राथमिकताओं को प्रभावित करती है।
विविधता ही भारत का ‘असली खाना’ है
फूड हिस्टोरियन पुष्पेश पंत के अनुसार, भारत का कोई एक ‘असली खाना’ नहीं है। भारतीय भोजन वास्तव में जमीन, जलवायु, भाषा और संस्कृति के बीच 5,000 साल पुरानी एक निरंतर बातचीत का परिणाम है।
पंजाब के ‘सरसों दा साग और मक्की दी रोटी’ से लेकर केरल की ‘फिश कोकोनट करी’ तक; राजस्थान के ‘दाल-बाटी-चूरमा’ से लेकर बंगाल के ‘माछेर झोल’ और मिठाई तक—हर क्षेत्र की अपनी विशिष्ट पहचान है। दक्षिण भारत की ‘चेट्टीनाड क्यूजीन’ अपने तीखे नॉनवेज के लिए जानी जाती है, तो उत्तर प्रदेश का शाकाहारी भोजन हल्के मसालों के लिए। कश्मीर का 36-व्यंजनों वाला ‘वाजवान’ और गोवा का पुर्तगाली प्रभाव वाला ‘विंदालू’ इसी विविधता के उदाहरण हैं।
अत: भारत की थाली को केवल ‘शाकाहारी’ या ‘मांसाहारी’ के खाने में नहीं बांटा जा सकता; इसकी विविधता और स्वीकार्यता ही इसकी असली पहचान है।
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