कोरबा में बीते 24 घंटों के भीतर दो स्कूली छात्राओं द्वारा आत्महत्या की खबर केवल एक सांख्यिकीय डेटा या सनसनीखेज हेडलाइन नहीं है; यह हमारे समाज के भीतर पनप रहे गहरे मानसिक संकट की चीख है। 9वीं और 10वीं कक्षा की दो किशोरियों का जीवन के संघर्ष से हार मान लेना इस बात का प्रमाण है कि हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो बाहर से तो तकनीक से सुसज्जित है, लेकिन भीतर से नितांत अकेली और कमजोर होती जा रही है।
संवाद का अभाव और डिजिटल दीवारें
आज के दौर में सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम पूरी दुनिया से ‘कनेक्टेड’ हैं, लेकिन अपने ही घर के कमरों में बंद बच्चों से ‘डिस्कनेक्टेड’ हो चुके हैं। किशोरावस्था (Adolescence) वह पड़ाव होता है जहाँ हार्मोनल बदलावों के साथ-साथ भविष्य की चिंता और पहचान का संकट चरम पर होता है। ऐसे में जब बच्चा अपने मन की उलझनें साझा नहीं कर पाता, तो वह फांसी के फंदे में समाधान खोजने लगता है। क्या हमने बच्चों को यह सिखाया है कि ‘असफलता’ या ‘मानसिक उलझन’ जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक पड़ाव है?
शिक्षा का बोझ या जीवन का डर?
अंजलि और उस दूसरी छात्रा की मौत के पीछे के ‘अज्ञात कारण’ अक्सर पढ़ाई का दबाव, करियर की अनिश्चितता या किसी अनकहे सामाजिक डर में छिपे होते हैं। हमारी शिक्षा व्यवस्था अंकों की होड़ में बच्चों को ‘मशीन’ तो बना रही है, लेकिन उन्हें ‘मानसिक रूप से सुदृढ़’ (Resilient) बनाने में विफल रही है। स्कूल केवल पाठ्यक्रम पूरा करने के केंद्र बन गए हैं, जबकि वहां नियमित ‘काउंसलिंग’ और ‘इमोशनल इंटेलिजेंस’ की कक्षाएं अनिवार्य होनी चाहिए थीं।
अभिभावकों और समाज की जिम्मेदारी
विशेषज्ञ बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि बच्चों के व्यवहार में आए छोटे बदलाव—जैसे चुप रहना, खाने-पीने की आदतों में बदलाव या सोशल मीडिया पर अत्यधिक सक्रियता—किसी बड़े तूफान की आहट हो सकते हैं। अभिभावकों को ‘उपदेशक’ बनने के बजाय ‘श्रोता’ बनना होगा।
कोरबा की ये घटनाएं एक सामूहिक चेतावनी हैं। यदि अब भी हम मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने को ‘तबू’ (Taboo) मानेंगे और बच्चों के मन की थाह नहीं लेंगे, तो हम न जाने कितनी और कलियों को खिलने से पहले ही मुरझाते देखते रहेंगे। प्रशासन को स्कूलों में मनोवैज्ञानिक परामर्श केंद्र सक्रिय करने चाहिए और परिवारों को प्रेम और विश्वास का ऐसा वातावरण बनाना चाहिए जहाँ बच्चा मौत को नहीं, बल्कि संवाद को चुने।
याद रखिए, कोई भी ग्रेड, कोई भी परीक्षा या कोई भी सामाजिक प्रतिष्ठा किसी मासूम की जान से बड़ी नहीं हो सकती।








