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न्याय का ‘सार्वजनिक’ संदेश और मर्यादा के प्रश्न

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रायगढ़  छत्तीसगढ़ के तमनार में पिछले दिनों जो हुआ, उसने न केवल कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ाईं, बल्कि मानवता और स्त्री गरिमा के दावों को भी तार-तार कर दिया। ड्यूटी पर तैनात एक महिला पुलिसकर्मी को भीड़ द्वारा दौड़ाना, उसे खेत में गिराकर उसकी वर्दी फाड़ना और उसकी चीखों को अनसुना कर देना किसी भी सभ्य समाज के लिए आत्मग्लानि का विषय है। सोमवार को जब मुख्य आरोपी चित्रसेन साव की गिरफ्तारी हुई और पुलिस ने उसका जुलूस निकाला, तो वह दृश्य इस आक्रोश की परिणति था जो पिछले एक महीने से खाकी के भीतर और समाज के संवेदनशील हिस्से में सुलग रहा था।

महिला पुलिसकर्मियों द्वारा आरोपी को चप्पलों की माला पहनाना और चूड़ियां भेंट करना—यह केवल एक पुलिसिया कार्रवाई नहीं थी, बल्कि यह ‘शक्ति’ का ‘कायरता’ को दिया गया जवाब था। जो हाथ एक लाचार महिला की अस्मत से खिलवाड़ कर रहे थे, उन हाथों में चूड़ियां पहनाकर महिला आरक्षकों ने समाज को यह संदेश देने की कोशिश की है कि हिंसा पौरुष नहीं, बल्कि मानसिक दिवालियापन है। आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज।

हालांकि, लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस द्वारा ‘ऑन-द-स्पॉट’ न्याय या सरेआम जुलूस निकालने की प्रक्रिया पर कानून के जानकार बहस कर सकते हैं, लेकिन यहाँ सवाल उस मनोबल का है जिसे बनाए रखना प्रशासन की प्राथमिकता है। जब वर्दी ही असुरक्षित हो जाए, तो आम नागरिक की सुरक्षा का भरोसा डगमगाने लगता है। एसपी दिव्यांग पटेल का यह कहना कि ‘यह कृत्य अक्षम्य है’, पुलिस विभाग की उस जीरो टॉलरेंस नीति को दर्शाता है जो खाकी के सम्मान को बहाल करने के लिए अनिवार्य है। आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज।

तमनार की इस घटना ने एक और कड़वा सच उजागर किया है कि आंदोलन की आड़ में अक्सर ऐसे असामाजिक तत्व घुस जाते हैं जिनका मकसद जनहित नहीं, बल्कि अराजकता फैलाना होता है। कोयला खदानों का विरोध अपनी जगह जायज हो सकता है, लेकिन विरोध की आड़ में किसी स्त्री की मर्यादा से खेलना किसी भी संघर्ष को अपवित्र कर देता है। आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज।

आज जरूरत इस बात की है कि इस मामले में न केवल गिरफ्तारी हो, बल्कि न्यायालय के माध्यम से इतनी कठोर सजा मिले कि भविष्य में कोई भी ‘भीड़’ का हिस्सा बनकर कानून को हाथ में लेने की हिमाकत न करे। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि वह होता हुआ दिखना भी चाहिए। रायगढ़ पुलिस की इस कार्रवाई ने न्याय के उस ‘दिखने’ वाले पहलू को पूरा किया है, जिससे आम जनता का कानून पर विश्वास पुनः स्थापित हो सके।आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज।

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन वह अधिकार किसी की गरिमा और कानून की सीमा को लांघने की अनुमति नहीं देता। खाकी का सम्मान समाज का सम्मान है।