नई शिक्षा नीति (NEP 2020) और राजीव गांधी काल का संदर्भ
नई दिल्ली 29 अगस्त Murli Manohar Joshi: भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल, पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री और पार्टी के ‘मार्गदर्शक मंडल’ के वरिष्ठ नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की शिक्षा नीति, प्रशासनिक प्राथमिकताओं और बजट आवंटन पर कड़े सवाल उठाए हैं। अमर उजाला को दिए एक विशेष साक्षात्कार में डॉ. जोशी ने देश में लगातार हो रहे पेपर लीक, शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण, प्राथमिक शिक्षा बजट में कटौती और ‘विकसित भारत’ की मौजूदा अवधारणा को लेकर सरकार को कठघरे में खड़ा किया।

पेपर लीक और शासन व्यवस्था पर तीखे प्रहार
देश भर में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक की घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए डॉ. जोशी ने कहा कि इसे महज परीक्षा प्रणाली की तकनीकी नाकामी मान लेना गलत होगा। उन्होंने इसे समाज और शासन तंत्र में गहराई से जड़ जमा चुके भ्रष्टाचार से जोड़ा।
डॉ. जोशी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब छात्र देखते हैं कि शिक्षकों की नियुक्तियों में रिश्वतखोरी चल रही है और समाज के हर क्षेत्र में धनबल का बोलबाला है, तो उनका नैतिक विश्वास डगमगाता है और वे गलत रास्ता चुनने से नहीं झिझकते। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा:
“मैं बड़े विनम्र भाव से पूछता हूं कि वाजपेयी जी के समय पेपर लीक क्यों नहीं होते थे? आज जब बैंक और व्यापार क्षेत्र घोटालों से घिरे हैं और सरकार खुद घोटालों में फंसी दिखती है, तो इसका सीधा और नकारात्मक असर शिक्षा व्यवस्था और छात्रों की मानसिकता पर पड़ता है।”
परीक्षाओं को कराने के लिए सरकार द्वारा विमानों, सेना और सुरक्षा एजेंसियों की मदद लेने की कोशिशों पर तंज कसते हुए वरिष्ठ बीजेपी नेता ने कहा कि सरकार के इन कदमों से ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई परीक्षा आयोजित नहीं की जा रही, बल्कि कोई युद्ध छिड़ गया हो।
घटता शिक्षा बजट और ‘विकसित भारत’ के पैमाने पर सवाल
सरकार की वित्तीय प्राथमिकताओं की आलोचना करते हुए डॉ. जोशी ने कहा कि देश में प्राथमिक शिक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य का बजट लगातार घटाया जा रहा है, जबकि बुनियादी ढांचे जैसे सड़कों और परिवहन पर अत्यधिक खर्च हो रहा है।
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विकास का वास्तविक अर्थ: उन्होंने कहा कि केवल सड़कें बना देना ही विकास का पर्याय नहीं है। सड़कें बनाने के लिए भी कुशल इंजीनियरों और आधुनिक मशीनों की आवश्यकता होती है, जो एक मजबूत और पारदर्शी शिक्षा प्रणाली से ही तैयार हो सकते हैं।
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रोजगार और शिक्षा का असंतुलन: डॉ. जोशी ने दिल्ली का उदाहरण देते हुए कहा कि आज M.A., Ph.D. और B.Ed. जैसी उच्च डिग्री हासिल करने वाले युवा सफाई कर्मचारी बनने या मामूली मानदेय पर संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) की नौकरियां करने को मजबूर हैं।
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शिक्षा और स्वास्थ्य में मुनाफाखोरी: उन्होंने कहा कि शिक्षा और चिकित्सा क्षेत्र को विशुद्ध रूप से मुनाफा कमाने का जरिया नहीं बनाया जाना चाहिए। यदि निजी क्षेत्र इसमें शामिल होता है, तो उसे अपने मुनाफे का एक निश्चित हिस्सा वापस शिक्षा और बुनियादी ढांचे के विकास में लगाना चाहिए।
‘विकसित भारत’ के सरकारी विजन पर बात करते हुए डॉ. जोशी ने कहा कि भारत को पश्चिमी या आधुनिक भौतिकवादी मानदंडों के बजाय मानवीय जीवन मूल्यों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। उन्होंने उदाहरण दिया कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर रहने वाले आदिवासी समुदाय भी अपनी जीवन शैली और सांस्कृतिक मूल्यों के मामले में पूरी तरह विकसित हैं।
नई शिक्षा नीति (NEP 2020) और राजीव गांधी काल का संदर्भ
नई शिक्षा नीति (NEP 2020) पर अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने पूर्ववर्ती अटल सरकार के समय का एक महत्वपूर्ण संदर्भ साझा किया।
उन्होंने बताया कि वाजपेयी सरकार के दौरान भी शिक्षा नीति को बदलने का प्रस्ताव आया था। हालांकि, तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने पुरानी नीति का गहन अध्ययन किया और यह निष्कर्ष निकाला कि किसी नीति को सिर्फ इसलिए खारिज या परिवर्तित नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि उसे राजीव गांधी की सरकार के समय तैयार किया गया था। यही वजह थी कि उस समय पुरानी नीति के मूल ढांचे को बरकरार रखते हुए केवल आवश्यक संशोधन ही किए गए थे।
NEP 2020 के निर्माण की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए डॉ. जोशी ने ‘नीति आयोग’ की भूमिका पर आपत्ति जताई। उन्होंने याद दिलाया कि उनके कार्यकाल के दौरान ‘योजना आयोग’ का काम केवल देश में श्रम और रोजगार की जरूरतों का आकलन करना था, वह शिक्षा के नीतिगत और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता था।
‘नेबरहुड स्कूल सिस्टम’ की वकालत
साक्षात्कार के अंत में डॉ. जोशी ने ‘नेबरहुड स्कूल सिस्टम’ (पड़ोस के स्कूल में पढ़ाई की व्यवस्था) को अनिवार्य रूप से लागू करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि देश के सभी बच्चों को—चाहे वे अमीर परिवार से हों या गरीब से—शुरुआती दौर में एक समान, पारदर्शी और मुफ्त शिक्षा मिलनी चाहिए ताकि समाज में असमानता की खाई को शुरुआत में ही पाटा जा सके।








