मुख्य बातें
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अगले एक हफ्ते में बड़ा राजनीतिक धमाका: टीएमसी में टूट के बाद कानूनी लड़ाई का नया दौर शुरू होने वाला है।
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सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी: पार्टी के वरिष्ठ सांसद और अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने दिए बड़े संकेत।
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दल-बदल कानून (10वीं अनुसूची) का शिकंजा: बागी 20 सांसदों और नए गुट (एनसीपीआई) की संसद सदस्यता पर कानूनी तलवार लटक गई है।
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अभिषेक बनर्जी को कानूनी सलाह: कल्याण बनर्जी ने पार्टी नेतृत्व को जल्द से जल्द शीर्ष अदालत का रुख करने की सलाह दी है।

कोलकाता 31 जुलाई Kalyan Banerjee : कोलकाता की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर पड़ी फूट अब धीरे-धीरे एक बड़े कानूनी और संवैधानिक संघर्ष का रूप लेती जा रही है। पार्टी के भीतर मचे इस घमासान के बीच, टीएमसी के वरिष्ठ सांसद और देश के जाने-माने अधिवक्ता कल्याण बनर्जी के एक बयान ने सियासी पारे को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। उनके संकेतों के मुताबिक, आने वाले एक सप्ताह के भीतर देश की राजनीति में एक बहुत बड़ा भूचाल देखने को मिल सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी
विश्वसनीय सूत्रों के हवाले से मिल रही जानकारी के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस अब अपनी पार्टी के बागी हुए 20 सांसदों और उनके द्वारा बनाए गए नए गुट ‘एनसीपीआई’ के खिलाफ सीधा सुप्रीम कोर्ट का रुख करने की तैयारी कर चुकी है। इस पूरी रणनीति के तहत, वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को एक औपचारिक पत्र या संदेश भेजकर बिना देर किए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करने की ठोस कानूनी सलाह दी है।
क्या है तकनीकी पेंच?
वर्तमान राजनीतिक स्थिति यह है कि एनसीपीआई (बागी गुट) को अभी तक लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की तरफ से किसी स्वतंत्र राजनीतिक दल या गुट के रूप में आधिकारिक मान्यता नहीं मिली है।
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तकनीकी रूप से टीएमसी के सांसद: भले ही ये बागी सांसद एनडीए की बैठकों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हों, लेकिन तकनीकी और कागजी तौर पर वे अभी भी तृणमूल कांग्रेस के पाले में ही गिने जा रहे हैं।
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स्पीकर के फैसले का इंतजार नहीं: इस पर कल्याण बनर्जी ने दो-टूक कहा है कि लोकसभा अध्यक्ष के फैसले का असीमित समय तक इंतजार नहीं किया जा सकता। न्याय के लिए अब शीर्ष अदालत जाना ही एकमात्र और सबसे प्रभावी विकल्प बचा है।
संविधान की 10वीं अनुसूची और बागी सांसदों का भविष्य
बागी सांसदों पर कड़ा प्रहार करते हुए कल्याण बनर्जी ने चेतावनी दी है कि ये सभी बागी नेता भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के बेहद कड़े दायरे में आते हैं।
“जिस दिन इन नेताओं ने पार्टी छोड़ी, उसी दिन से इनकी संसद सदस्यता पर कानूनी तलवार लटक चुकी है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे किसकी बैठकों में शामिल हो रहे हैं और किसके साथ मंच साझा कर रहे हैं। इस पूरे प्रकरण का अंतिम और निर्णायक फैसला अब देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ही करेगा।” — कल्याण बनर्जी
इसके साथ ही, कल्याण ने बागी गुट के उस दावे को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें वे अपनी तरफ दो-तिहाई सांसदों के समर्थन का हवाला दे रहे थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून के मुताबिक दो-तिहाई का नियम पूरी पार्टी के व्यापक विलय या विभाजन पर लागू होता है, न कि केवल कुछ महत्वाकांक्षी सांसदों के अपनी मर्जी से अलग हो जाने पर।
सुदीप बंद्योपाध्याय पर निशाना और ‘सस्पेंस’
कल्याण बनर्जी ने बागी गुट के प्रमुख चेहरों में शामिल सुदीप बंद्योपाध्याय और अन्य नेताओं को सीधे तौर पर “अवसरवादी” करार दिया। जब उनसे यह सवाल किया गया कि क्या ऐतिहासिक 21 जुलाई की रैली के बाद भी इन बागी विधायकों और सांसदों के लिए टीएमसी में वापसी के रास्ते खुले रहेंगे?
इस पर उन्होंने किसी भी तरह की नरमी दिखाने से इनकार करते हुए रहस्य बरकरार रखा और कहा:
“अगले हफ्ते के बाद एक बड़ा धमाका देखने को मिलेगा, बस थोड़ा सा इंतजार और कीजिए।”
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