नुआपाड़ा (ओडिशा) | विशेष रिपोर्ट

नियम जनता की सुविधा के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन जब यही नियम संवेदनहीनता की पराकाष्ठा पार कर जाएं, तो समाज का सिर शर्म से झुक जाता है। ओडिशा के नुआपाड़ा जिले के बड़गांव थाना क्षेत्र से एक ऐसी ही तस्वीर सामने आई है, जिसने देश के बैंकिंग सिस्टम और प्रशासनिक ढांचे की चूलें हिला दी हैं। एक बेबस परिवार को अपनी मृत सदस्य का शव महज़ चंद रुपयों के लिए बैंक के भीतर ले जाना पड़ा।
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ग्रामीण बैंक की चौखट और वो ‘खौफनाक’ मंजर
प्राप्त जानकारी के अनुसार घटना ग्रामीण बैंक (Utkal Grameen Bank) की है। यहाँ के एक खाताधारक, 60 वर्षीय गुंजन देई की मृत्यु के बाद उनके भाई को अंतिम संस्कार के लिए पैसों की सख्त जरूरत थी। गुंजन देई के खाते में जन-धन योजना की कुछ राशि जमा थी। जब भाई ने बैंक से वह राशि मांगी, तो बैंक प्रबंधन ने कथित तौर पर मानवता को ताक पर रखकर ‘नियमों’ का हवाला दिया।

“खाताधारक को लाओ, तभी मिलेंगे पैसे”
मृतक महिला के भाई का आरोप है कि बैंक अधिकारियों ने बिना फिजिकल वेरिफिकेशन (भौतिक उपस्थिति) के पैसे देने से इनकार कर दिया। बार-बार मिन्नतें करने के बाद भी जब पत्थर दिल सिस्टम नहीं पसीजा, तो मजबूर भाई अपनी बहन की लाश को कंधे पर लादकर गांव की गलियों से होते हुए सीधे बैंक के अंदर ले आया। बैंक के केबिनों के सामने पड़ी लाश को देखकर वहां मौजूद हर शख्स सन्न रह गया।
इंसानियत शर्मसार, व्यवस्था पर उठे सवाल
यह घटना सिर्फ एक परिवार की मजबूरी नहीं, बल्कि उस सिस्टम की हार है जो डिजिटल और स्मार्ट होने का दावा तो करता है, लेकिन जिसमें संवेदना की एक बूंद भी नहीं बची।
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क्या एक मृत व्यक्ति खुद चलकर बैंक में अंगूठा लगाने आएगा?
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क्या बैंक के पास ऐसी आपात स्थितियों के लिए कोई मानवीय प्रोटोकॉल नहीं है?
इस घटना के वीडियो और समाचार वायरल होने के बाद अब प्रशासन जवाब देते नहीं बन रहा है। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर इन कागजी नियमों के बीच इंसानियत कब तक दम तोड़ती रहेगी।
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