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आधी रात, विदेशी करेंसी और गुप्त उड़ान: क्या था 1.7 अरब डॉलर की उस डील का सच जिसने अमेरिका-ईरान को आमने-सामने खड़ा किया?

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वॉशिंगटन/तेहरान: दुनिया आज ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव को देख रही है, लेकिन इस दुश्मनी की आग में घी डालने का काम उस एक ‘सीक्रेट ऑपरेशन’ ने किया था, जिसका जिक्र आज भी अमेरिकी राजनीति में भूकंप ला देता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा पर निशाना साधते हुए उस 1.7 अरब डॉलर (लगभग 14 हजार करोड़ रुपये) के कैश ट्रांजेक्शन को “राष्ट्रीय अपमान” करार दिया है

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वह ‘गुप्त उड़ान’ और कैश से भरे पैलेट्स

साल 2016 की एक रात, वर्जीनिया और मैरीलैंड के बैंकों से भारी मात्रा में नकदी निकाली गई। यह पैसा अमेरिकी डॉलर में नहीं, बल्कि यूरो, स्विस फ्रैंक और अन्य विदेशी मुद्राओं में था। नकदी को लकड़ी के बड़े-बड़े पैलेट्स (Pallets) पर लादा गया और एक बिना किसी निशान वाले मालवाहक विमान (Cargo Plane) के जरिए ईरान भेजा गया।

ट्रंप का दावा है कि यह ईरान की “वफादारी खरीदने” और “सम्मान पाने” की एक नाकाम कोशिश थी। उन्होंने इसे ओबामा प्रशासन का एक ‘डिजास्टर’ बताया है।

क्यों बैंक ट्रांसफर के बजाय भेजा गया कैश?

सवाल उठता है कि डिजिटल युग में इतना सारा पैसा कैश में क्यों भेजा गया?

  • वजह: उस समय ईरान पर कड़े अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रतिबंध लगे थे। ईरान वैश्विक बैंकिंग सिस्टम (SWIFT) से बाहर था, जिससे इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर नामुमकिन था।

  • क्या यह रिश्वत थी? ओबामा प्रशासन का तर्क था कि यह ईरान का ही पुराना बकाया था। 1979 की क्रांति से पहले शाह के शासन ने अमेरिका को लड़ाकू विमानों के लिए पैसे दिए थे, जो क्रांति के बाद फंस गए थे। अमेरिका ने 400 मिलियन डॉलर की मूल राशि और 1.3 अरब डॉलर का ब्याज चुकाया।

विवाद की असली जड़: ‘फिरौती’ या ‘कानूनी समझौता’?

जिस वक्त यह कैश ईरान पहुँचा, उसी वक्त ईरान ने अपनी जेलों में बंद कई अमेरिकी नागरिकों को रिहा किया।

  • ट्रंप का आरोप: यह अमेरिकी बंधकों को छुड़ाने के लिए दी गई ‘फिरौती’ (Ransom) थी।

  • ओबामा का पक्ष: यह एक कानूनी सेटलमेंट था। अगर अमेरिका अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में यह केस हार जाता, तो उसे इससे कई गुना ज्यादा ब्याज देना पड़ता।

JCPOA: वो डील जिसे ट्रंप ने ‘बकवास’ कहा

इस पूरे विवाद के केंद्र में है Joint Comprehensive Plan of Action (JCPOA) यानी 2015 की परमाणु डील।

  • मकसद: ईरान को परमाणु बम बनाने से रोकना।

  • बदले में: ईरान पर लगे प्रतिबंधों में ढील देना। ट्रंप ने इसी डील को “इतिहास का सबसे बुरा समझौता” बताकर 2018 में अमेरिका को इससे बाहर कर लिया था, जिसका नतीजा आज दोनों देशों के बीच जारी सीधा टकराव है।

फ्लैशबैक: 1979 की वो क्रांति जिसने सब बदल दिया

ईरान कभी अमेरिका का सबसे पक्का दोस्त था। लेकिन 1979 की इस्लामिक क्रांति ने सब पलट दिया। जब तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्जा हुआ और 52 अमेरिकियों को 444 दिनों तक बंधक बनाया गया, तब से शुरू हुआ यह ‘कोल्ड वॉर’ आज तक जारी है।

आज ट्रंप का यह बयान साफ करता है कि अमेरिका की नजर में ईरान को दिया गया वह एक-एक पैसा आज भी विवादों के विमान पर सवार है।

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