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छत्तीसगढ़ राज्यसभा चुनाव: अमरजीत भगत का दिल्ली में बड़ा दांव, बोले- ‘बाहरी नहीं, अब छत्तीसगढ़िया को मिले मौका’

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रायपुर/दिल्ली: छत्तीसगढ़ में राज्यसभा की दो सीटों के लिए चुनावी रणभेरी बज चुकी है। नामांकन प्रक्रिया शुरू होते ही सियासी गलियारों में हलचल तेज है, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा पूर्व मंत्री अमरजीत भगत के दिल्ली दौरे की है। कांग्रेस के कद्दावर आदिवासी नेता भगत ने सीधे दिल्ली पहुंचकर हाईकमान के सामने अपनी दावेदारी पेश कर दी है, जिससे पार्टी के भीतर मची खींचतान अब सार्वजनिक हो गई है।

लोकल बनाम बाहरी: भगत का ‘छत्तीसगढ़िया’ कार्ड

अमरजीत भगत ने कांग्रेस आलाकमान से मुलाकात के दौरान दो टूक शब्दों में कहा कि राज्यसभा उम्मीदवार के चयन में ‘क्षेत्रीय संतुलन’ और ‘स्थानीय प्रतिनिधित्व’ को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उनका इशारा पिछले कुछ वर्षों में छत्तीसगढ़ कोटे से राज्य के बाहर के नेताओं को दिल्ली भेजने की परंपरा की ओर था।

भगत ने तर्क दिया कि सरगुजा और बस्तर जैसे आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों के नेताओं को मौका देने से न केवल कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा, बल्कि आगामी चुनावों में पार्टी को मजबूती भी मिलेगी।

चुनाव का पूरा गणित

छत्तीसगढ़ में राज्यसभा सदस्य के.टी.एस. तुलसी और फूलो देवी नेताम का कार्यकाल 9 अप्रैल 2026 को समाप्त हो रहा है। चुनाव आयोग द्वारा घोषित कार्यक्रम इस प्रकार है: नामांकन की अंतिम तिथि: 5 मार्च 2026 , मतदान: 16 मार्च 2026 , सीटों की स्थिति: राज्य विधानसभा में संख्या बल के हिसाब से एक सीट भाजपा के पाले में जाना तय है, जबकि दूसरी सीट पर कांग्रेस और अन्य दावेदारों के बीच कांटे की टक्कर है।

इन दिग्गजों के बीच फंसा है पेंच

भगत के अलावा कांग्रेस के कई अन्य ‘हेवीवेट’ नेता भी इस रेस में सक्रिय हैं:

  • टी.एस. सिंहदेव: पूर्व डिप्टी सीएम की वरिष्ठता उन्हें एक मजबूत दावेदार बनाती है।

  • दीपक बैज: पीसीसी अध्यक्ष और बस्तर का चेहरा होने के कारण उनकी दावेदारी को नजरअंदाज करना मुश्किल है।

  • ताम्रध्वज साहू और मोहन मरकाम: ये पूर्व मंत्री भी जातिगत समीकरणों के सहारे अपनी गोटी फिट करने में लगे हैं।

कांग्रेस हाईकमान के लिए ‘अग्निपरीक्षा’

2023 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस छत्तीसगढ़ में अपनी जमीन तलाश रही है। पार्टी एक तरफ संसद में भाजपा को घेरने के लिए ‘फायरपावर’ (मजबूत वक्ता) चाहती है, तो दूसरी तरफ उसे स्थानीय नाराजगी का भी डर है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी ‘बाहरी’ चेहरे पर दांव लगाते हैं या अमरजीत भगत की ‘छत्तीसगढ़िया’ मांग पर मुहर लगाते हैं।

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