प्रयागराज की पावन धरती पर मौनी अमावस्या के अवसर पर जो दृश्य उभरे, वे न केवल विचलित करने वाले हैं बल्कि प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। ज्योतिष पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज के जुलूस को रोका जाना और उसके बाद संतों व वेदपाठी बटुकों के साथ कथित धक्का-मुक्की, आस्था के सबसे बड़े समागम में एक काला अध्याय जोड़ती है। आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज।
सुरक्षा का तर्क और दोहरा मापदंड
प्रशासन का यह कहना कि ‘भीड़ के दबाव’ के कारण रथ को रोका गया, पहली नजर में तार्किक लग सकता है। लेकिन जब इसी तर्क की तुलना उसी मेले में घूम रहे अन्य ‘विशेष’ संतों के लग्जरी काफिलों से की जाती है, तो प्रशासन की ‘निष्पक्षता’ तार-तार हो जाती है। एक तरफ शंकराचार्य की पालकी को सुरक्षा का खतरा बताकर रोका जाता है, वहीं दूसरी ओर करोड़ों की गाड़ियों के काफिले को बेरोक-टोक अनुमति मिलना यह दर्शाता है कि नियम सबके लिए समान नहीं हैं।आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज।
आस्था और प्रोटोकॉल के बीच का संघर्ष
शंकराचार्य जैसे उच्च धार्मिक पद की अपनी गरिमा और परंपराएं होती हैं। उनके शिष्यों और बुजुर्ग संतों के साथ किया गया व्यवहार पुलिस की संवेदनहीनता को दर्शाता है। यदि प्रशासन को सुरक्षा की चिंता थी, तो इसे संवाद और सम्मान के साथ भी सुलझाया जा सकता था। बल प्रयोग और हिरासत की कार्रवाई ने एक आध्यात्मिक उत्सव को विवाद के अखाड़े में तब्दील कर दिया। आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज।
सरकारें अक्सर संतों के सम्मान और सनातन संस्कृति के संरक्षण का दावा करती हैं, लेकिन जमीन पर ऐसी घटनाएं उन दावों की हवा निकाल देती हैं। जब धर्म और सत्ता का गठजोड़ चुनिंदा ‘करीबियों’ को विशेषाधिकार देने लगे और पारंपरिक पदों की अवहेलना होने लगे, तो असंतोष स्वाभाविक है। बिना स्नान किए शंकराचार्य का वापस लौटना न केवल उनका व्यक्तिगत विरोध है, बल्कि प्रशासन के लिए एक आत्मचिंतन का विषय होना चाहिए।
न्याय और व्यवस्था केवल रसूखदारों के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए होनी चाहिए जो इस पावन तट पर श्रद्धा लेकर आता है।








