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नहीं रहे बिहार के ‘धरती पकड़’: 288 से अधिक चुनाव लड़ने वाले 97 वर्षीय नागरमल बाजोरिया का पटना में निधन, भागलपुर में हुआ अंतिम संस्कार

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पटना 6 सितंबर: बिहार की चुनावी राजनीति के सबसे अनोखे, चर्चित और अदम्य जीवटता के प्रतीक ‘धरती पकड़’ नागरमल बाजोरिया अब हमारे बीच नहीं रहे। 97 वर्ष की उम्र में पटना स्थित अपने निवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली। वह पिछले कुछ समय से उम्र से जुड़ी विभिन्न बीमारियों से जूझ रहे थे। उनके निधन की खबर फैलते ही पटना से लेकर उनकी कर्मभूमि भागलपुर तक सामाजिक और राजनीतिक गलियारों में गहरा शोक छा गया।

निधन के बाद उनके पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शनों के लिए पटना से भागलपुर लाया गया, जहां बरारी स्थित गंगा तट श्मशान घाट पर पूरे राजकीय व सामाजिक सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके अंतिम संस्कार में शहर के गणमान्य व्यक्तियों, नेताओं, समाजसेवियों और स्थानीय लोगों की भारी भीड़ उमड़ी।

लाहौर से भागलपुर तक का सफर और सादगी भरा जीवन

नागरमल बाजोरिया का पारिवारिक इतिहास बेहद दिलचस्प रहा है। उनका परिवार मूल रूप से अविभाजित भारत के लाहौर (अब पाकिस्तान) से ताल्लुक रखता था। वर्ष 1930 के आसपास उनका परिवार लाहौर छोड़ कर बिहार के भागलपुर में आ बसा। भागलपुर का ‘एम.पी. द्विवेदी मार्ग’ उनका स्थायी ठिकाना बना और यही शहर उनकी जीवनभर की कर्मभूमि रहा।

भागलपुर के पुराने लोग उन्हें उनकी अद्वितीय सादगी के लिए याद करते हैं। खादी का कुर्ता-पायजामा पहने नागरमल जी को अक्सर साइकिल से या पैदल ही शहर की सड़कों पर घूमते देखा जाता था। जब चुनाव का समय आता, तो वे बिना किसी बड़े तामझाम, लाउडस्पीकर या गाड़ियों के काफिले के, खुद ही अपनी जेब से पर्चे निकालकर लोगों के बीच बांटते और वोट मांगते थे। जीवन के अंतिम दिनों में वे अपने बेटे के साथ पटना में रह रहे थे।

चुनाव सत्ता के लिए नहीं, लोकतंत्र में भागीदारी का जरिया

सामान्यतः चुनावी राजनीति में उतरने वाले हर प्रत्याशी का अंतिम लक्ष्य जीत दर्ज कर विधायक, सांसद या मंत्री बनना होता है। लेकिन नागरमल बाजोरिया के लिए चुनाव का गणित कुछ अलग ही था। वे चुनाव को जीत या हार की कसौटी पर कभी नहीं कसते थे, बल्कि इसे लोकतंत्र में एक आम नागरिक की सबसे बड़ी और सीधी भागीदारी मानते थे।

वे हमेशा कहते थे— “चुनाव लड़ना सिर्फ नेताओं का काम नहीं है, यह संविधान द्वारा हर नागरिक को दिया गया अधिकार है और मैं अपने इसी अधिकार का प्रयोग करता हूँ।” इसी विचार और जुनून के कारण वे लगातार चुनाव दर चुनाव पर्चा भरते रहे और पूरे देश में ‘धरती पकड़’ के नाम से मशहूर हो गए।

वीवी गिरि से लेकर प्रणब मुखर्जी तक: राष्ट्रपति चुनाव में भी ठोकी दावेदारी

नागरमल बाजोरिया का चुनावी सफर सिर्फ स्थानीय निकाय या विधानसभा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद ‘राष्ट्रपति’ के लिए भी अपनी दावेदारी पेश की:

  • 1969 का ऐतिहासिक राष्ट्रपति चुनाव: बाजोरिया ने पूर्व राष्ट्रपति वी.वी. गिरि के खिलाफ राष्ट्रपति पद का पर्चा भरकर सबको चौंका दिया था।

  • 2012 का राष्ट्रपति चुनाव: जब यूपीए ने प्रणब मुखर्जी को अपना उम्मीदवार बनाया, तब बाजोरिया ने एक बार फिर राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपना नामांकन दाखिल किया। हालांकि, प्रस्तावकों की तकनीकी कमी के कारण उनका नामांकन रद्द हो गया था।

93 की उम्र में सोनिया गांधी और शत्रुघ्न सिन्हा के खिलाफ एक साथ 3 सीटों से चुनाव

उम्र ढलने के साथ लोगों का उत्साह कम हो जाता है, लेकिन बाजोरिया का चुनावी जुनून बढ़ता ही गया। 93 वर्ष की ढलती उम्र में भी उन्होंने एक साथ तीन हाई-प्रोफाइल लोकसभा सीटों से चुनाव लड़कर नया इतिहास रच दिया था:

  1. रायबरेली: कांग्रेस की दिग्गज नेता सोनिया गांधी के खिलाफ।

  2. पटना साहिब: मशहूर अभिनेता और नेता शत्रुघ्न सिन्हा के खिलाफ।

  3. पुरानी दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी की प्रतिष्ठित लोकसभा सीट।

288 से ज्यादा चुनाव, गिनीज बुक में नाम और समाजसेवी पहचान

नागरमल बाजोरिया के नाम 288 से भी अधिक छोटे-बड़े चुनाव (पंचायत से लेकर राष्ट्रपति तक) लड़ने का अनूठा रिकॉर्ड दर्ज है। देश में सबसे ज्यादा बार चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों में शुमार होने के कारण उनका नाम विभिन्न रिकॉर्ड बुक्स और ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ की दावेदारी से भी जोड़ा जाता रहा।

कई चुनावों में उनकी जमानतें जब्त हुईं, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। एक चुनाव खत्म होते ही वे अगले चुनाव की तैयारी में जुट जाते थे।

चुनावी मैदान से परे: एक संवेदनशील समाजसेवी

वे केवल चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी नहीं थे, बल्कि समाजसेवा में भी उनका योगदान अनुकरणीय था:

  • गरीब बेटियों का विवाह: जरूरतमंद परिवारों की बेटियों की शादी में आर्थिक मदद देना।

  • शिक्षा को बढ़ावा: गरीब बच्चों के लिए किताबें, कॉपियां और अध्ययन सामग्री बांटना।

  • जल संकट का निवारण: भागलपुर के विभिन्न इलाकों में अपने निजी खर्च से नलकूप (हैंडपंप) लगवाना।

नागरमल बाजोरिया का जाना बिहार की राजनीति के एक ऐसे अनोखे अध्याय का अंत है, जिसने यह साबित किया कि लोकतंत्र में जीत और हार से भी बड़ा नागरिक का संकल्प और उसका जुझारूपन होता है।

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