मुख्य बातें
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राज्यसभा में ‘लुंगीवाला’ टिप्पणी को लेकर भारी हंगामा देखने को मिला, जिसके बाद कार्यवाही को दोपहर 2 बजे तक स्थगित करना पड़ा।
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केरल से राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने बीजेपी सांसद सुष्मिता देव पर यह आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप लगाया है।
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जॉन ब्रिटास ने राज्यसभा के नियम 188 के तहत सभापति को विशेषाधिकार हनन (Breach of Privilege) का नोटिस सौंपा है।
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संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू और सभापति सीपी राधाकृष्णन ने मामले को आपसी बातचीत और कक्ष में सुनकर जल्द सुलझाने का आश्वासन दिया है।
नई दिल्ली Lungi Wala Controversy: संसद के उच्च सदन (राज्यसभा) में क्षेत्रीय पहचान और पारंपरिक पहनावे को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। केरल से राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने बीजेपी सांसद सुष्मिता देव के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया है। यह पूरा विवाद सोमवार को टैक्स से जुड़े कामकाज पर हुई चर्चा के दौरान एक टिप्पणी को लेकर शुरू हुआ है

क्या है पूरा मामला?
सांसद जॉन ब्रिटास का आरोप है कि जब वह सदन में वैधानिक प्रस्ताव पर अपनी बात रख रहे थे, तब सुष्मिता देव ने उनके भाषण में बार-बार बाधा डाली और उन्हें अपमानजनक लहजे में ‘लुंगीवाला’ कहकर संबोधित किया। ब्रिटास का कहना है कि यह टिप्पणी सदन के भीतर एक से अधिक बार की गई और इसे महज दो सांसदों के बीच का व्यक्तिगत विवाद नहीं माना जा सकता है। इस घटना के विरोध में राज्यसभा की कार्यवाही को कुछ समय के लिए 2 बजे तक स्थगित करना पड़ा।
नियम 188 के तहत नोटिस और कार्यवाही की मांग
जॉन ब्रिटास ने राज्यसभा की कार्यप्रणाली और कामकाज के नियम 188 के तहत औपचारिक रूप से यह नोटिस दिया है। उन्होंने सभापति से मांग की है कि इस कथित अपमानजनक टिप्पणी को लेकर विशेषाधिकार हनन की कार्यवाही शुरू की जाए। ब्रिटास के अनुसार, इस घटना के दौरान सदन में मौजूद अन्य सांसदों (जैसे सुखेंदु शेखर रॉय, पी. विल्सन और एल.के. सुधीश) ने भी इस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई थी।
‘क्षेत्रीय और सांस्कृतिक पहचान को बनाया गया निशाना’
भारी मन से इस मुद्दे को उठाते हुए जॉन ब्रिटास ने कहा कि यह सदन की गरिमा, प्रतिष्ठा और सम्मान का सवाल है। उन्होंने कहा:
“मैं एक गर्वित भारतीय, दक्षिण भारतीय और निश्चित रूप से एक गर्वित मलयाली हूं। भाषा, क्षेत्र या पारंपरिक पहनावे के आधार पर किसी भी सदस्य को संसद में निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए।”
ब्रिटास ने याद दिलाया कि 1960 और 1970 के दशक में मुंबई में दक्षिण भारतीयों के खिलाफ चलाए गए अभियानों के दौरान ‘लुंगीवाला’ और ‘मद्रासी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल अपमानजनक रूप से किया जाता था। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत का संविधान देश की विविधता का सम्मान करता है और यही विविधता इस देश की एकता को मजबूत करती है।
इस पर सभापति की ओर से टिप्पणी आई कि सदन में कोई दक्षिण भारतीय या उत्तर भारतीय नहीं होता, हम सभी केवल भारतीय हैं।
सरकार और सभापति की प्रतिक्रिया
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इस मामले पर मध्यस्थता करते हुए सभापति को सुझाव दिया कि दोनों पक्षों को अपने कक्ष में बुलाया जाना चाहिए और उनकी बात सुनने के बाद जो उचित लगे, उस पर निर्णय लिया जाना चाहिए।
सभापति सीपी राधाकृष्णन ने सभी सदस्यों को नसीहत देते हुए कहा कि वे एक-दूसरे की भावनाओं और संवेदनाओं का पूरा सम्मान करें। उन्होंने स्वीकार किया कि सदन में भाषण के दौरान असम्मानजनक टिप्पणियों के कई मामले सामने आ रहे हैं। सभापति ने आश्वस्त किया कि वह संबंधित माननीय सदस्यों को जल्द ही अपने कक्ष में बुलाएंगे और इस विवाद को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाएंगे।
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