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एम्स रायपुर में ‘वर्ल्ड एसोसिएशन फॉर डायनेमिक साइकियाट्री’ के द्वितीय राष्ट्रीय सम्मेलन का भव्य आयोजन

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रायपुर 27 अप्रैल 2026 : अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), रायपुर के मनोरोग विभाग द्वारा ‘वर्ल्ड एसोसिएशन फॉर डायनेमिक साइकियाट्री’ (इंडिया चैप्टर) के द्वितीय राष्ट्रीय सम्मेलन का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया। छत्तीसगढ़ साइकियाट्रिक सोसाइटी, वर्ल्ड एसोसिएशन फॉर सोशल साइकियाट्री और इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के सहयोग से आयोजित इस दो दिवसीय समागम में मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियों और समाधानों पर गहन मंथन हुआ।

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प्रमुख अतिथि और उद्घाटन

कार्यक्रम का औपचारिक उद्घाटन मुख्य अतिथि लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) अशोक जिंदल द्वारा किया गया। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथियों के रूप में शामिल हुए:प्रो. डॉ. टी.एस.एस. राव: अध्यक्ष, इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी।डॉ. अभिषेक पल्लव: वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, चांदखुरी।

संस्थान की ओर से डॉ. रॉय अब्राहम कल्लियावल्ली (अध्यक्ष, WADP इंडिया), डॉ. राकेश चड्ढा, डॉ. स्नेहिल गुप्ता और डॉ. लोकेश सिंह सहित कई वरिष्ठ विशेषज्ञ मौजूद रहे।


वैश्विक और राष्ट्रीय विशेषज्ञों का संगम

सम्मेलन में देश-विदेश के लगभग 120 विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी बात रखने वाले प्रमुख वक्ताओं में शामिल थे:▪️प्रो. नॉर्मन सार्टोरियस (स्विट्जरलैंड)▪️प्रो. स्वर्णा सिंह (यूनाइटेड किंगडम)▪️प्रो. एमेरिटस मोहन इसाक (ऑस्ट्रेलिया)▪️डॉ. आयरीन बट्टाग्लिनी (इटली)

राष्ट्रीय स्तर पर प्रो. आर. रघुराम, डॉ. अजीत भिडे और प्रो. प्रताप शरण जैसे विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक सत्रों के माध्यम से ‘डायनेमिक साइकियाट्री’ और मानसिक स्वास्थ्य के सामाजिक परिप्रेक्ष्य पर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की।


मुख्य विचार और चर्चा के बिंदु

सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य मानव मन के विविध आयामों को समझना था। विशेषज्ञों ने निम्नलिखित बिंदुओं पर विशेष जोर दिया:

1. समग्र उपचार (Holistic Treatment): बीमारी नहीं, व्यक्ति का इलाज

पारंपरिक चिकित्सा पद्धति अक्सर केवल शारीरिक लक्षणों या मस्तिष्क के रासायनिक असंतुलन पर ध्यान केंद्रित करती है, लेकिन इस सम्मेलन में ‘बायो-साइको-सोशल’ (Bio-Psycho-Social) मॉडल पर जोर दिया गया।

  • सामाजिक संदर्भ: एक व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य उसके आसपास के परिवेश, परिवार, आर्थिक स्थिति और समाज से गहराई से जुड़ा होता है। विशेषज्ञों ने कहा कि उपचार तब तक प्रभावी नहीं हो सकता जब तक रोगी के सामाजिक वातावरण को न समझा जाए।

  • मनोवैज्ञानिक पहलू: मरीज के विचार, उसका व्यवहार और अतीत के अनुभव (Trauma) बीमारी को बढ़ाने या कम करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।

  • उद्देश्य: उपचार का लक्ष्य केवल लक्षणों को मिटाना नहीं, बल्कि व्यक्ति को समाज में पुनः स्थापित करना और उसकी जीवन की गुणवत्ता (Quality of Life) में सुधार करना है।


2. काउंसलिंग की आवश्यकता: प्रशिक्षित विशेषज्ञों की मांग

मुख्य अतिथि लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) अशोक जिंदल ने वर्तमान स्वास्थ्य ढांचे में एक बड़ी कमी की ओर इशारा किया।

  • बढ़ता अंतराल (Treatment Gap): मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के बढ़ते मामलों की तुलना में प्रशिक्षित काउंसलरों की संख्या बहुत कम है। केवल दवाइयां देना पर्याप्त नहीं है; मरीजों को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने और उनसे निपटने के लिए पेशेवर मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।

  • संस्थागत आह्वान: उन्होंने ‘इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी’ से अपील की कि वे ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम और पाठ्यक्रम तैयार करें जिससे जमीनी स्तर पर कुशल काउंसलर्स की एक नई पीढ़ी तैयार की जा सके।

  • प्रारंभिक हस्तक्षेप: प्रशिक्षित काउंसलर शुरुआती चरण में ही मानसिक समस्याओं की पहचान कर सकते हैं, जिससे बीमारी को गंभीर होने से रोका जा सकता है।


3. विविधता (Diversity): विभिन्न आयु समूहों पर प्रभावशीलता

मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियां हर उम्र में अलग होती हैं, इसलिए उनके उपचार का तरीका भी विशिष्ट होना चाहिए। सम्मेलन में इस विविधता पर विस्तार से चर्चा हुई:

  • बाल एवं किशोर मनोचिकित्सा: बच्चों में व्यवहार संबंधी समस्याओं और किशोरों में बढ़ते तनाव व सोशल मीडिया के प्रभाव पर चर्चा की गई। उनके लिए खेल-कूद (Play Therapy) और व्यवहार थेरेपी को प्रभावी माना गया।

  • वयस्क और कामकाजी वर्ग: वयस्कों में कार्यस्थल का तनाव, वैवाहिक समस्याएं और अवसाद मुख्य मुद्दे रहे। यहाँ ‘डायनेमिक साइकियाट्री’ के माध्यम से गहन मनोचिकित्सा पर जोर दिया गया।

  • वृद्धजन (Geriatric Psychiatry): बुजुर्गों में अकेलेपन, डिमेंशिया और अल्जाइमर जैसी समस्याओं के समाधान के लिए विशेष सत्र आयोजित किए गए।

सांस्कृतिक झलक और प्रतियोगिताएं

यह आयोजन न केवल शैक्षणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा, बल्कि इसमें छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को भी कला, शिल्प और फोटोग्राफी प्रदर्शनी के जरिए दर्शाया गया।

  • छात्र सहभागिता: स्नातक और स्नातकोत्तर छात्रों के लिए क्विज़ और शैक्षणिक प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया।

  • इको-फ्रेंडली पहल: पूरे सम्मेलन को पर्यावरण के अनुकूल (Environment Friendly) तरीके से संपन्न किया गया।

“मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती आवश्यकता को देखते हुए प्रशिक्षित काउंसलरों की फौज तैयार करना समय की मांग है।” — लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) अशोक जिंदल

निष्कर्ष: यह सम्मेलन इस बात की पुष्टि करता है कि आधुनिक मनोचिकित्सा अब केवल बंद कमरों या दवाइयों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक और मानवीय दृष्टिकोण अपना रही है।

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