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नतीजे, हुनर और मैनेजमेंट: कांग्रेस का नया ‘संगठनात्मक मॉडल’ और फेरबदल की इनसाइड स्टोरी

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नई दिल्ली  Rahul Gandhi New Team :  कांग्रेस पार्टी ने अपने सांगठनिक ढांचे में एक बड़ा रणनीतिक बदलाव किया है। अब पार्टी केवल बड़े दिग्गजों के नाम के सहारे आगे बढ़ने के बजाय परफॉर्मेंस, संगठनात्मक क्षमता और तीखे पॉलिटिकल मैनेजमेंट को प्राथमिकता दे रही है। (आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज) यह नया मॉडल केंद्रीय नेतृत्व और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच एक मजबूत ‘मिडिल लेयर’ तैयार करने की दिशा में बड़ा कदम है।

📍नए चेहरों पर दांव: मीडिया हाइप से ज्यादा जमीनी काम पर जोर

महाराष्ट्र में राजनीति के गलियारों में अपेक्षाकृत कम चर्चित रहने वाले डॉ. सिरिवेल्ला प्रसाद को बड़ी जिम्मेदारी देना, हरियाणा में एआईसीसी (AICC) सचिव से सीधे प्रभारी बनाए गए संजय दत्त और उत्तर प्रदेश में राजेंद्र पाल गौतम जैसे नए चेहरों को मैदान में उतारना इसी बड़े बदलाव का साफ संकेत है।

महाराष्ट्र के मामले में डॉ. सिरिवेल्ला प्रसाद की नियुक्ति वाकई सबका ध्यान खींचती है।(आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज) वह भले ही राष्ट्रीय राजनीति के कोई बहुत हाई-प्रोफाइल चेहरे न हों, लेकिन उनके पास संगठन का लंबा और ठोस अनुभव है। पार्टी का सीधा संदेश यह है कि अब प्रभारी की भूमिका केवल मीडिया में पार्टी का चेहरा चमकाने भर की नहीं है, बल्कि संगठन को सीधे जमीन पर यानी जिलों तक पहुंचाना और स्थानीय समीकरणों को चुस्त-दुरस्त रखना भी बेहद जरूरी है।

इसी तरह हरियाणा में संजय दत्त को एआईसीसी सचिव से सीधा प्रदेश प्रभारी बनाना भी पार्टी की दूसरी पंक्ति के नेताओं को ऊपर लाने का एक बेहतरीन प्रयोग माना जा रहा है। इसका मतलब साफ है कि जो नेता अब तक बड़े प्रभारियों के अंडर में रहकर काम संभालते थे, उन्हें अब खुद राज्य की कमान सौंपकर उनकी काबिलियत की कड़ी परीक्षा ली जा रही है। (आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज) वहीं, उत्तर प्रदेश में राजेंद्र पाल गौतम का चयन संगठन की मजबूती के साथ-साथ सही सामाजिक प्रतिनिधित्व को साधने का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करता है।

📍’पॉलिटिकल मैनेजर्स’ पर बड़ा दांव: सुरजेवाला और पायलट की भूमिका

इस पूरे बदलाव की दूसरी सबसे दिलचस्प तस्वीर रणदीप सुरजेवाला और सचिन पायलट के रूप में सामने आती है। पार्टी ने रणदीप सुरजेवाला को गुजरात का नया प्रभारी बनाने के साथ-साथ कर्नाटक की जिम्मेदारी भी उनके पास ही सुरक्षित रखी है। कर्नाटक में जब कांग्रेस की धमाकेदार जीत हुई थी, तब संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल बिठाने में उनकी भूमिका बेहद अहम रही थी। (आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज) अब उनसे यही उम्मीद की जा रही है कि वे गुजरात में भी कांग्रेस संगठन को चुनावी मुकाबले के लिए पूरी तरह तैयार कर देंगे।

पंजाब में सचिन पायलट की एंट्री इस पॉलिटिकल मैनेजर मॉडल को और भी ज्यादा साफ कर देती है। पंजाब में कांग्रेस के सामने न केवल मुख्य विपक्ष से मुकाबला करने की बड़ी चुनौती है, बल्कि पार्टी के अंदरूनी कलह और गुटबाजी को शांत करना भी बहुत जरूरी था। भूपेश बघेल की जगह जब से पंजाब की कमान पायलट के हाथों में आई है, तब से पार्टी के अलग-अलग धड़ों के नेताओं के तेवरों में भी नरमी साफ देखने को मिल रही है।

📍करीबी होने से नहीं, सिर्फ ‘रिजल्ट’ से तय होगी जगह

असम से जितेंद्र सिंह का हटना भी इसी नए बदलाव के संदर्भ में बहुत कुछ कहता है। राहुल गांधी के बेहद करीबी माने जाने वाले जितेंद्र सिंह की जगह अब अनुभवी भूपेश बघेल को असम की कमान सौंप दी गई है। इससे राजनीतिक हलकों में यह कड़ा संदेश बिल्कुल साफ चला गया है कि राहुल गांधी की इस नई टीम में सिर्फ नजदीकी या सिफारिश नहीं चलेगी, बल्कि जमीन पर किया गया काम और ठोस संगठनात्मक नतीजे ही सबसे ज्यादा मायने रखेंगे।

📍130+ इंटरव्यू और सचिवों की नई टीम की तैयारी

इस बड़े बदलाव की अगली और सबसे अहम कड़ी एआईसीसी सचिवों की नई टीम साबित होने वाली है। इसके लिए राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और केसी वेणुगोपाल जैसे शीर्ष नेताओं ने मिलकर करीब 130 से ज्यादा नेताओं के आमने-सामने इंटरव्यू लिए हैं। पार्टी ने अपने मौजूदा 64 सचिवों के कामकाज की पूरी समीक्षा की है, जिसके बाद इनमें से लगभग आधे चेहरों को बदले जाने की पूरी संभावना जताई जा रही है। इन तमाम उम्मीदवारों से उनके पिछले काम, पार्टी में योगदान, कमजोर राज्यों में संगठन को मजबूत करने का उनका प्लान और भविष्य की भूमिका को लेकर तीखे सवाल पूछे गए हैं।

📍दिल्ली और राज्यों के बीच मजबूत ‘मिडिल लेयर’ तैयार करने की जुगत

कुल मिलाकर देखा जाए तो कांग्रेस पार्टी अब केवल ऊपर के पदों पर कुछ गिने-चुने चेहरे बदलकर औपचारिकता पूरी नहीं कर रही है। इसके पीछे की असल कोशिश दिल्ली में बैठे केंद्रीय नेतृत्व और राज्यों के जमीनी संगठनों के बीच एक मजबूत और असरदार ‘मिडिल लेयर’ यानी मध्यम स्तर की लीडरशिप तैयार करने की है। प्रदेश प्रभारियों के इस हालिया फेरबदल से इस नए मॉडल की पहली झलक तो दुनिया के सामने आ ही चुकी है, जिसमें नए चेहरे, धुरंधर जमीनी कार्यकर्ता और तेज-तर्रार पॉलिटिकल मैनेजर शामिल हैं। अब आने वाली सचिवों की नई सूची यह पूरी तरह साफ कर देगी कि राहुल गांधी की इस नई कांग्रेस में आखिरकार किस तरह के नेताओं को सबसे ज्यादा तवज्जो मिलने वाली है।

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