रायपुर 4 सितंबर CM Vishnu Deo Say । शिक्षक दिवस के पावन अवसर पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने प्रदेश के समस्त गुरुजनों के नाम एक बेहद भावुक और आत्मीय पत्र लिखकर उन्हें सादर नमन किया है। यह पत्र केवल एक प्रशासनिक संदेश नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के दिल की गहराइयों से निकली आवाज है, जिसने खुद अभावों और संघर्षों के बीच शिक्षा के महत्व को समझा और जिया है। मुख्यमंत्री साय ने अपने पत्र में बचपन की खट्टी-मीठी स्मृतियों, संघर्ष भरे दौर और आज की आधुनिक शिक्षा व्यवस्था के बीच के अंतर को बहुत ही मार्मिक ढंग से पिरोया है।

“दस वर्ष की उम्र में उठ गया था पिता का साया…”
मुख्यमंत्री साय ने अपने अतीत के पन्नों को पलटते हुए बताया कि उनका जन्म जशपुर जिले के दूरस्थ बगिया गांव के एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। उनकी शुरुआती पढ़ाई गांव के ही प्राइमरी स्कूल से शुरू हुई। जीवन ने बहुत ही छोटी उम्र में उनकी कठिन परीक्षा लेनी शुरू कर दी। जब वे महज दस वर्ष के थे और चौथी कक्षा में पढ़ रहे थे, तभी उनके पिता का साया सिर से उठ गया। इतनी कम उम्र में ही परिवार की देखरेख, खेती-किसानी और छोटे भाइयों के भविष्य की चिंता उनके कंधों पर आ पड़ी।
गांव में पांचवीं तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद आगे की शिक्षा के लिए उन्हें कुनकुरी जाना पड़ा। वहां लोयोला उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में एक छोटे से कमरे में रहकर उन्होंने पढ़ाई आगे बढ़ाई। आगे भी पढ़ने का बहुत मन था, लेकिन पारिवारिक परिस्थितियों और जिम्मेदारियों की वजह से पढ़ाई का सिलसिला बीच में ही रुक गया। उन्होंने खुद खेती संभाली ताकि उनके छोटे भाई अपनी पढ़ाई पूरी कर सकें।
स्लेट-तख्ती से स्मार्ट क्लास का सुखद बदलाव
अपने दौर और वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की तुलना करते हुए मुख्यमंत्री ने लिखा कि उस समय गांव के बच्चे के लिए शिक्षा पाना आज जितना आसान नहीं था। न पक्की सड़कें थीं, न आवागमन के साधन और न ही पढ़ाई के पर्याप्त संसाधन। आर्थिक तंगी कई बच्चों के सपनों को बीच में ही तोड़ देती थी।
उन्होंने भावुक होकर कहा, “आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मन को बहुत सुखद अनुभूति होती है। हमारी पीढ़ी ने जिस छत्तीसगढ़ में स्लेट, तख्ती और खड़िया (चॉक) से अपनी पढ़ाई शुरू की थी, आज उसी माटी के बच्चे स्मार्ट क्लासरूम में बैठकर पढ़ रहे हैं। डिजिटल माध्यमों से दुनिया भर का ज्ञान अब उनकी उंगलियों पर है और वे विज्ञान एवं आधुनिक तकनीक से कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहे हैं।”
“कक्षा में बैठा हर बच्चा अनगिनत संभावनाएं लेकर आता है”
गुरु-शिष्य की परंपरा को भारतीय संस्कृति की आत्मा बताते हुए मुख्यमंत्री साय ने प्रदेश के शिक्षकों से एक बेहद मार्मिक और आत्मीय आग्रह किया। उन्होंने कहा कि एक शिक्षक के सामने कक्षा में बैठा हर बच्चा अपने भीतर असीम संभावनाएं समेटे होता है। कोई भविष्य का वैज्ञानिक, कोई खिलाड़ी, डॉक्टर, कलाकार तो कोई जनसेवक बन सकता है।
उन्होंने शिक्षकों का आह्वान करते हुए कहा, “हर बच्चे में छिपी प्रतिभा को पहचानिए। विशेष रूप से उस बच्चे का हाथ थामिए जो किसी अभाव, संकोच या पारिवारिक तंगी के कारण पीछे छूट रहा है। हो सकता है कि आपकी कही प्रोत्साहन की एक बात या आपका थोड़ा-सा विश्वास उस बच्चे के पूरे जीवन की दिशा बदल दे। शिक्षा का मकसद सिर्फ सिलेबस खत्म करना नहीं, बल्कि बच्चे के व्यक्तित्व, आत्मविश्वास और संस्कारों को गढ़ना है।”
मुख्यमंत्री नहीं, एक विद्यार्थी के रूप में आभार
पत्र के अंत में मुख्यमंत्री साय ने अत्यंत श्रद्धाभाव से लिखा कि आज वे केवल एक मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि जशपुर के उस छोटे से गांव के स्कूल में पढ़ने वाले उस बालक के रूप में भी सभी गुरुजनों के सामने नतमस्तक हैं। समय बदलेगा, तकनीक बदलेगी और पढ़ाई के तरीके भी बदलेंगे, लेकिन गुरु और शिष्य के बीच स्नेह, आदर और विश्वास का जो पवित्र रिश्ता है, उसकी महत्ता युगों-युगों तक अमिट रहेगी।








