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अरे! न्याय की लंबी दास्तान और सच्‍चाई की जीत: पूर्व पीएम डॉ. मनमोहन सिंह कोल ब्लॉक मामले में हुए पूरी तरह बेदाग

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Triumph of Truth After a Long Quest for Justice: Former PM Dr. Manmohan Singh Cleared of All Charges in Coal Block Allocation Case

“सच्चाई परेशान हो सकती है, पराजित नहीं।” — डॉ. मनमोहन सिंह के जीवन और उनके बेदाग चरित्र पर यह बात बिल्कुल सटीक बैठती है।

नई दिल्ली: देश के पूर्व प्रधानमंत्री और अपनी सादगी, ईमानदारी व अर्थशास्त्रीय दूरदृष्टि के लिए पूरी दुनिया में सम्मान पाने वाले डॉ. मनमोहन सिंह भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके दामन पर लगे एक बेबुनियाद दाग को आखिरकार कानून की अदालत ने हमेशा के लिए धो दिया है। उनके निधन के करीब डेढ़ साल बाद, देश की सबसे बड़ी अदालत—सुप्रीम कोर्ट ने कोयला ब्लॉक आवंटन (कोलगेट) मामले में चल रही लंबी और थका देने वाली कानूनी कार्यवाही का अंत करते हुए उन्हें आधिकारिक रूप से पूरी तरह बेदाग करार दिया है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए इस बहुचर्चित मामले को मेरिट के आधार पर हमेशा के लिए बंद कर दिया है। इस फैसले के साथ ही देश के एक बेहद सम्मानित राजनेता के जीवन के अंतिम वर्षों में उनके संघर्ष और कानूनी अनिश्चितताओं का एक भावुक और सुखद अंत हुआ है।

अदालत में क्या हुआ? वकीलों की संक्षिप्त और असरदार दलीलें

मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में एक भावनात्मक माहौल देखने को मिला। पूर्व प्रधानमंत्री की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत के सामने बेहद नपे-तुले और संवेदनशील शब्दों में अपनी बात रखी। उनके साथ वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी भी मौजूद थे।

सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने अदालत से नम्र निवेदन करते हुए कहा:

“अब जबकि डॉ. मनमोहन सिंह इस दुनिया में नहीं हैं, अदालत अपने अंतिम आदेश में यह स्पष्ट करे कि उनके खिलाफ की गई पूर्व की प्रतिकूल टिप्पणियों को हटाया जाए। मैं सिर्फ इतना चाहता हूं कि उनके सम्मान पर कोई आंच न रहे।”

इसके बाद, सुप्रीम कोर्ट ने बिना किसी लंबी देरी के, कुछ ही मिनटों में अपना ऐतिहासिक फैसला सुना दिया।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा और स्पष्ट फैसला

सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने अपने फैसले में निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) के रुख पर कड़ा सवाल उठाया। पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि:

  • इस मामले में CBI द्वारा बार-बार दाखिल की गई क्लोजर रिपोर्ट को खारिज करने के लिए ट्रायल कोर्ट के पास कोई ठोस और पर्याप्त कारण नहीं था।

  • विशेष अदालत द्वारा क्लोजर रिपोर्ट को अस्वीकार कर समन जारी करना न्यायसंगत नहीं था।

  • सर्वोच्च अदालत ने ट्रायल कोर्ट के उस पुराने आदेश को रद्द करते हुए CBI की क्लोजर रिपोर्ट को मंजूर कर लिया और मामले को पूरी तरह समाप्त कर दिया।

इस फैसले के साथ ही डॉ. मनमोहन सिंह के खिलाफ जारी सभी समन और आपराधिक कार्यवाही अब कानूनी रूप से समाप्त हो चुकी हैं।

क्या था पूरा मामला? 2015 का वह दौर और CBI की रिपोर्ट

यह पूरा मामला कोयला ब्लॉक आवंटन से जुड़ा हुआ था। वर्ष 2015 में एक विशेष अदालत ने तत्कालीन पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को समन जारी कर दिया था। हालांकि, देश की प्रमुख जांच एजेंसी CBI ने अपनी गहन जांच के बाद बार-बार (दो बार) क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी। CBI का साफ कहना था कि डॉ. मनमोहन सिंह के खिलाफ भ्रष्टाचार या अभियोजन चलाने लायक पर्याप्त साक्ष्य मौजूद नहीं हैं।

इसके बावजूद, विशेष अदालत ने CBI की रिपोर्ट को ठुकराते हुए समन जारी कर दिया था। इस आदेश के खिलाफ डॉ. मनमोहन सिंह ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

जब सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में लगाई थी रोक

तारीख 1 अप्रैल 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अदालत के समन पर रोक लगा दी थी। उस समय भी कपिल सिब्बल ने अदालत में बहुत मजबूत और तार्किक दलील दी थी। उन्होंने कहा था कि कोयला ब्लॉक का आवंटन पूरी तरह से एक प्रशासनिक निर्णय था। किसी निजी कंपनी को कोयला ब्लॉक आवंटित करना अपने आप में कोई अपराध या गैरकानूनी कृत्य नहीं है। यदि स्क्रीनिंग कमेटी की सिफारिश से अलग हटकर भी कोई प्रशासनिक निर्णय लिया गया, तो केवल इसी आधार पर प्रधानमंत्री या किसी अधिकारी को अपराधी नहीं माना जा सकता।

सुनवाई के दौरान CBI की ओर से भी वरिष्ठ अधिवक्ता आर.एस.चीमा और विशेष लोक अभियोजक ए. कार्तिक ने पक्ष रखा। CBI ने अपनी क्लोजर रिपोर्ट का पुरजोर समर्थन किया और अदालत से इसे स्वीकार करने का अनुरोध किया, जिस पर मुहर लग गई।

भावुक अंत: बेदाग विदाई

डॉ. मनमोहन सिंह का 26 दिसंबर 2024 को निधन हो गया था। उनके निधन के बाद भी यह कानूनी लड़ाई अदालतों में लंबित थी, जो उनके चाहने वालों के दिलों में एक टीस छोड़ रही थी। आज सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने उस टीस को कम कर दिया है।

यह फैसला इस बात का प्रमाण है कि सत्य की राह पर चलने वाले और अपनी ईमानदारी के लिए पहचाने जाने वाले व्यक्ति का चरित्र अंततः कानून की कसौटी पर खरा उतरता है। इस ऐतिहासिक निर्णय से देश भर में उनके समर्थकों और शुभचिंतकों ने राहत की सांस ली है।

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