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छत्तीसगढ़ की माटी का गौरव थमा: पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का 72 वर्ष की आयु में निधन, कला जगत में शोक की लहर

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दुर्ग/रायपुर: छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति को वैश्विक पटल पर चमकाने वाली विश्वप्रसिद्ध पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं। 72 वर्ष की आयु में उन्होंने रायपुर स्थित एम्स (AIIMS) में अंतिम सांस ली। वे पिछले 27 मई से अस्पताल में भर्ती थीं, जहाँ 4 और 5 जुलाई की दरमियानी रात करीब 3:15 बजे उनका निधन हो गया। उनके अवसान की खबर से देश-विदेश के कला प्रेमियों और पूरे छत्तीसगढ़ में शोक की लहर दौड़ गई है।

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13 वर्ष की उम्र से शुरू हुआ सफर, ‘कापालिक शैली’ को दी नई ऊंचाई

मूल रूप से दुर्ग जिले के गनियारी गाँव की रहने वाली तीजन बाई ने महज 13 साल की उम्र में अपने नाना से पंडवानी गायन की दीक्षा ली थी। अपनी अद्वितीय प्रतिभा, कड़कड़ाती आवाज और ‘कापालिक शैली’ के दमदार अभिनय से उन्होंने महाभारत की कथाओं को जीवंत कर दिया। जब वे हाथ में तंबूरा लेकर मंच पर हुंकार भरती थीं, तो देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर के दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे।

छत्तीसगढ़ की संस्कृति को दिलाया अंतरराष्ट्रीय सम्मान

तीजन बाई ने पंडवानी को केवल भारत तक सीमित नहीं रखा, बल्कि एशिया, यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया सहित दर्जनों देशों में अपनी प्रस्तुतियां देकर छत्तीसगढ़िया संस्कृति का डंका बजाया।

राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सम्मान:

  • 1988: पद्मश्री से सम्मानित

  • 2003: पद्म भूषण से नवाजा गया

  • 2019: देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्व विभूषण’ से विभूषित

  • अन्य सम्मान: संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नृत्य शिरोमणि, कला शिरोमणि और मानद डी.लिट्. की उपाधि।

पैतृक गाँव गनियारी में होगा राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार

पारिवारिक सूत्रों के अनुसार, डॉ. तीजन बाई पिछले एक महीने से काफी अस्वस्थ थीं और भोजन न कर पाने के कारण केवल जूस और तरल पदार्थों पर थीं। उनके परिवार में बेटा, बहू और नातिन हैं। उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गाँव गनियारी में पूरे राजकीय सम्मान और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ किया जाएगा।

डॉ. तीजन बाई का जाना केवल एक महान कलाकार का जाना नहीं है, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति के एक स्वर्णिम युग का अंत है। उनकी बुलंद आवाज और पंडवानी की यह अनमोल विरासत आने वाली पीढ़ियों को युगों-युगों तक प्रेरित करती रहेगी।

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