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हसदेव बांगो के विस्थापितों का बुका में ‘महाजुतान’: डॉ. चरणदास महंत बोले- आदिवासियों का हक नहीं मिला तो जाएंगे हाईकोर्ट

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कोरबा, 24 मई । हसदेव बांगो बांध के विस्थापित परिवारों के जल, जंगल और जमीन के अधिकारों को लेकर रविवार को बुका में एक विशाल महासम्मेलन का आयोजन किया गया। इस महाधिवेशन में कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने हुंकार भरते हुए विस्थापित परिवारों को बांगो बांध में मछली आखेट (पकड़ने) और उसकी बिक्री का स्वतंत्र अधिकार वापस देने की पुरजोर मांग उठाई। नेताओं ने साफ किया कि आदिवासियों के हक पर डाका डालने वाली ठेका प्रथा को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

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महासम्मेलन में नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज, कोरबा सांसद ज्योत्सना महंत और पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव , पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल विशेष रूप से शामिल हुए और विस्थापितों की लड़ाई में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होने का संकल्प लिया।

52 गांवों का दर्द: ‘1991 में उजड़े, 2003 में ठेकेदारों ने आजीविका भी छीन ली’

बुका में आयोजित इस महासम्मेलन में बांगो बांध परियोजना से प्रभावित 52 गांवों के विस्थापित परिवार हजारों की संख्या में पहुंचे। इस दौरान महिलाओं की उपस्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय रही।

विस्थापित ग्रामीणों ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि:

  • वर्ष 1991 में विस्थापन: बांध के लिए उन्होंने अपनी जमीनें और घर कुर्बान कर दिए।

  • शुरुआती राहत: विस्थापन के बाद शुरुआती सालों में वे स्वयं नदी-जलाशय से मछली पकड़कर सरकार को मामूली रॉयल्टी देते थे, जिससे सलीके से उनकी आजीविका चल रही थी।

  • 2003 का वज्रपात: वर्ष 2003 में जल संसाधनों पर ठेका प्रथा लागू कर दी गई। इसके बाद से स्थानीय आदिवासियों और विस्थापितों का यह पारंपरिक अधिकार पूरी तरह समाप्त हो गया। वे पिछले दो दशकों से इसके खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं।

“मछली पकड़ने पर आदिवासियों से मारपीट बर्दाश्त नहीं” : डॉ. चरणदास महंत

महासम्मेलन को संबोधित करते हुए नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने सीधे तौर पर ठेका पद्धति और स्थानीय प्रशासन को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा:

“अगर कोई विस्थापित आदिवासी अपनी पेट की आग बुझाने के लिए जलाशय से मछली निकालने का प्रयास करता है, तो उसके साथ मारपीट और दुर्व्यवहार किया जाता है। यह गुंडागर्दी अब नहीं चलेगी। सरकार स्वयं विधानसभा में यह स्वीकार कर चुकी है कि वर्ष 2007 से लागू वनाधिकार कानून जलाशयों में मछली पकड़ने वाले आदिवासियों पर भी लागू होता है। इसके बावजूद जमीन पर इस कानून का पालन क्यों नहीं किया जा रहा?”

डॉ. महंत ने मंच से दो टूक चेतावनी देते हुए कहा कि यदि सरकार ने जल्द ही विस्थापितों को उनका स्वतंत्र अधिकार वापस नहीं लौटाया, तो कांग्रेस पार्टी विस्थापितों के साथ मिलकर हाईकोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ेगी।

सिंहदेव का निशाना- ‘हमारे तैयार पेसा कानून को ठंडे बस्ते में डाला’

पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव ने भी इस मौके पर सरकार की नीतियों पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि वर्ष 2022 में पंचायत व ग्रामीण विकास मंत्री रहते हुए उन्होंने आदिवासी क्षेत्रों के लिए पेसा (PESA) कानून का नियम व प्रारूप तैयार किया था, ताकि स्थानीय जल-जंगल-जमीन पर पहला हक आदिवासियों का हो। लेकिन सरकार बदलने के बाद आज तक उसे पूरी तरह लागू नहीं किया गया और स्थानीय समुदायों के अधिकारों की अनदेखी की जा रही है।

नियमों का विरोधाभास: नीति बड़ी या आदिवासियों का हक?

छत्तीसगढ़ सरकार की मौजूदा नीति के मुताबिक, 1,000 हेक्टेयर से अधिक बड़े जलाशयों में मछली पालन के लिए ठेका पद्धति लागू की जाती है। वहीं दूसरी ओर, केंद्र और राज्य का वनाधिकार कानून साफ कहता है कि आदिवासी क्षेत्रों में प्राकृतिक व जल संसाधनों पर पहला अधिकार स्थानीय आदिवासियों का है। इसी नीतिगत विरोधाभास और ठेकेदारों के रसूख के कारण आज 52 गांवों के विस्थापित दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

इस महासम्मेलन में हजारों की संख्या में पहुंचे ग्रामीणों और कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने एक सुर में कहा कि जब तक मांग पूरी नहीं होती, आंदोलन थमेगा नहीं।

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