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वेदांता हादसा: क्या कानून की नजर में ‘मालिक’ और ‘लोक सेवक’ बराबर हैं? FIR पर छिड़ी कानूनी बहस

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रायपुर/कोरबा , छत्तीसगढ़ : सक्ति सिंघीतराई वेदांता  पावर प्लांट हादसे ने एक गंभीर कानूनी और राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। 24 मजदूरों की मौत के बाद छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा कंपनी के चेयरमैन अनिल अग्रवाल पर दर्ज की गई FIR को लेकर अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या एक निजी संस्थान का ‘मालिक’ और सरकारी उपक्रम का ‘प्रमुख’ कानून के सामने समान जवाबदेही रखते हैं?

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कानूनी पेच: ‘मालिक’ बनाम ‘अधिकारी’

भाजपा सांसद नवीन जिंदल ने तर्क दिया कि रेलवे जैसे बड़े हादसों में चेयरमैन पर FIR क्यों नहीं होती? कानूनी विशेषज्ञों ने इस पर ‘फैक्ट्रीज एक्ट 1948’ और ‘लोक सेवक’ की परिभाषा के आधार पर स्थिति साफ की है:

  • फैक्ट्रीज एक्ट 1948 (धारा 92): यह कानून निजी कारखानों पर कड़ाई से लागू होता है। इसमें स्पष्ट है कि किसी भी हादसे के लिए ‘ऑक्यूपियर’ (मालिक) और मैनेजर संयुक्त रूप से जिम्मेदार होंगे। वेदांता इसी कानून के दायरे में आता है।

  • रेलवे का अपवाद: रेलवे केंद्र सरकार का अंग है और इसके चेयरमैन या रेल मंत्री ‘मालिक’ नहीं, बल्कि ‘लोक सेवक’ (Public Servant) होते हैं। उन पर विभागीय कार्रवाई, निलंबन या नैतिक आधार पर इस्तीफे का दबाव होता है, लेकिन फैक्ट्री कानून के तहत ‘मालिक’ की तरह सीधे अपराधी नहीं माना जाता।

  • निजी जवाबदेही: वेदांता जैसी निजी कंपनी में चेयरमैन सीधे तौर पर संचालन के लिए जिम्मेदार ‘मालिक’ की श्रेणी में आते हैं, इसलिए कानूनी रूप से उनका नाम FIR में शामिल करना अनिवार्य हो जाता है।


ठेका प्रथा: जिम्मेदारी से बचने का रास्ता?

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार हादसे के बाद वेदांता ने बयान दिया है कि मृतक मजदूर सब-कॉन्ट्रैक्टर कंपनी एनजीएसएल (NGSL) के थे। यह बयान ‘कॉर्पोरेट जिम्मेदारी’ से बचने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

बड़ा सवाल: क्या बॉयलर का निरीक्षण, सेफ्टी वाल्व की चेकिंग और प्रेशर गेज की मरम्मत जैसे उच्च जोखिम वाले कामों की निगरानी खुद वेदांता कर रही थी या इसे भी पेटी कॉन्ट्रैक्टरों के भरोसे छोड़ दिया गया था? अधिक मुनाफे और कम लागत के चक्कर में स्थायी मजदूरों की जगह ठेका प्रथा अपनाना सुरक्षा में बड़ी चूक का कारण माना जा रहा है।


वर्तमान स्थिति और धाराएं

फिलहाल बिलासपुर संभागायुक्त मामले की जांच कर रहे हैं। अनिल अग्रवाल और अन्य पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की इन धाराओं में मामला दर्ज है:

  1. धारा 106: लापरवाही से मौत (जमानती, अधिकतम 5 साल सजा)

  2. धारा 289: मशीनरी से संबंधित लापरवाही (जमानती, 6 माह सजा)

चूंकि दोनों धाराएं जमानती हैं, इसलिए 24 मौतों के बावजूद तत्काल गिरफ्तारी की संभावना कम है।दूसरी ओर, जांजगीर और कोरबा के सांसदों ने केंद्रीय मंत्रियों को पत्र लिखकर इस मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग तेज कर दी  है।

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