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“🎯 जिस वोट बैंक के दम पर 15 साल राज किया, उसी के ’17 सिपहसालारों’ ने फेर ली ममता से नजरें… जानिए क्यों बागी हुई मुस्लिम ब्रिगेड!”

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TMC Political Crisis :   पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी के टिकट पर कम से कम 31 मुस्लिम विधायक चुनकर आए थे, जो पार्टी के कुल 80 विधायकों का लगभग 40% हैं। यह आंकड़े गवाही देते हैं कि ममता बनर्जी की सत्ता की चाबी हमेशा इस समुदाय के पास रही। लेकिन आज समीकरण पूरी तरह उलट चुके हैं।//आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज//

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विधायक दल के नेता के रूप में बागी ऋतब्रत बनर्जी के समर्थन में विधानसभा स्पीकर को पत्र सौंपने वाले 58 विधायकों में से कम से कम 17 प्रमुख मुस्लिम विधायक शामिल हैं। यानी पार्टी के आधे से अधिक मुस्लिम विधायक अब खुलकर ममता बनर्जी के खिलाफ खड़े हो चुके हैं। अब ममता के खेमे में केवल 13 या 14 मुस्लिम विधायक ही बचे हैं, जिन पर भी बागी गुट लगातार डोरे डाल रहा है।

सबसे बड़ा झटका: जिस ‘जावेद खान’ की जमीन पर बना था TMC दफ्तर, उन्होंने ही बढ़ाई दूरी

ममता बनर्जी के लिए सबसे दर्दनाक और चौंकाने वाला नाम जावेद अहमद खान का है। कसबा के विधायक और बेहद प्रभावशाली नेता जावेद खान को कभी ममता बनर्जी का ‘दाहिना हाथ’ माना जाता था।

एक कड़वा सच: कोलकाता में स्थित टीएमसी का मुख्य मुख्यालय ‘तृणमूल भवन’ जिस जमीन पर खड़ा है, वह जमीन खुद जावेद अहमद खान ने ही उपलब्ध कराई थी। भवानीपुर (ममता के गढ़) में भी दीदी का पूरा दारोमदार उन्हीं पर टिका था।

आज उसी जावेद खान ने ममता बनर्जी पर ‘पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की कमी’ का सीधा आरोप लगाते हुए बगावत का बिगुल फूंक दिया है। ऋतब्रत बनर्जी के साथ मंच साझा करते हुए उन्होंने ममता को सीधी चुनौती दी: “देखते हैं आने वाले दिनों में ममता बनर्जी के साथ कितने लोग रहते हैं।”

बागी और वफादार: मुस्लिम विधायकों की नई सूची

बागी गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी के साथ जाने वाले और ममता बनर्जी के साथ रुकने वाले प्रमुख चेहरों की स्थिति अब कुछ इस प्रकार है:

बागी गुट (ऋतब्रत बनर्जी के साथ) वफादार गुट (ममता बनर्जी के साथ)
जावेद अहमद खान (कसबा – कद्दावर नेता) अब्दुर रहीम बॉक्सी (मालतीपुर)
अख़रुज्जमान ख़ान (रघुनाथगंज – नए चीफ व्हिप) मुशर्रफ़ हुसैन (इटाहार)
इमानी बिस्वास (सूती) मतिउर रहमान (हरिश्चंद्रपुर)
नियामत शेख़ (हरिहरपाड़ा) (नोट: वफादार गुट के इन चेहरों पर भी टूटने का खतरा मंडरा रहा है)
हामिदुल रहमान (चोपड़ा) & ग़ुलाम रब्बानी (पूर्व मंत्री)

विश्लेषण: आखिर दीदी का सबसे भरोसेमंद ‘वोट बैंक’ क्यों छोड़ रहा है साथ?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मुस्लिम नेताओं के इस अप्रत्याशित हृदय परिवर्तन के पीछे तीन बेहद ठोस और रणनीतिक कारण काम कर रहे हैं:

1. मुस्लिम वोट बैंक का दरकना और ध्रुवीकरण

हालिया चुनावी नतीजों ने साफ कर दिया कि मुस्लिम समुदाय का एकतरफा वोट अब टीएमसी के पास नहीं रहा, उसमें बिखराव शुरू हो चुका है। इसके साथ ही, कई मुस्लिम बहुल जिलों में बीजेपी के पक्ष में हिंदू वोटों का भारी एकजुट होना (Counter-Polarization) देखा गया। ऐसे में इन नेताओं को समझ आ गया है कि सिर्फ धार्मिक वोट बैंक की पुरानी राजनीति के भरोसे अब अपनी सीट बचा पाना नामुमकिन है।

2. ‘विजेता के साथ रहो’ (Winner Takes All) की मजबूरी

बंगाल की राजनीतिक संस्कृति हमेशा से सत्ता केंद्रित रही है। विपक्षी विधायक होने का मतलब है अगले 5 साल तक विकास कार्यों और प्रशासनिक पावर से पूरी तरह कट जाना। //आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज// बंगाल में स्थिति यह है कि सत्ता के सहयोग के बिना एक विपक्षी विधायक अपने क्षेत्र के मरीज को अस्पताल में बेड तक नहीं दिला सकता। ऐसे में अपने प्रभाव को जिंदा रखने के लिए ये विधायक ऋतब्रत बनर्जी गुट के साथ जा रहे हैं, जिसे केंद्र और राज्य की सत्ता पर काबिज बीजेपी का परोक्ष (Indirect) समर्थन हासिल है।

3. केंद्रीय जांच एजेंसियों (ED-CBI) का खौफ

बागी हुए कई बड़े नेताओं पर आय से अधिक संपत्ति और कोलकाता में बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण को संरक्षण देने के गंभीर आरोप हैं। जावेद खान समेत कई नेता जांच के दायरे में हैं। नए राजनीतिक परिदृश्य में केंद्रीय एजेंसियों (ED/CBI) के शिकंजे और जेल जाने के डर ने इन नेताओं को ममता बनर्जी से दूरी बनाने और सुरक्षित ठिकाना ढूंढने पर मजबूर कर दिया है।

बड़ा सवाल: क्या सत्ता ही तृणमूल को जोड़े रखने का एकमात्र गोंद थी?

15 साल तक लगातार सत्ता के शिखर पर रहने के बाद, हार की पहली ही चोट टीएमसी बर्दाश्त नहीं कर पा रही है। //आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज// विधायकों में मची इस भगदड़ और इस्तीफों के अंतहीन सिलसिले को देखकर अब राजनीतिक गलियारों में एक ही यक्ष प्रश्न गूंज रहा है: क्या तृणमूल कांग्रेस का वजूद अब खत्म होने वाला है?

यह साफ हो गया है कि वैचारिक प्रतिबद्धता के बजाय केवल ‘सत्ता का सुख’ ही इस पार्टी को एक सूत्र में पिरोए हुए था। जैसे ही सत्ता हाथ से गई, वैसे ही पूरी पार्टी बिखर गई। ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन का यह सबसे अंधकारमय अध्याय है, जहां वह अपनी ही बनाई 28 साल पुरानी पार्टी को रेत की तरह हाथों से फिसलते हुए देख रही हैं।

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