प्योंगयांग/सिओल: दुनिया में अगर कहीं ‘परफेक्ट’ लोकतंत्र देखना हो, तो उत्तर कोरिया चले जाइए (बशर्ते वहां से वापस आने की गारंटी हो)। यहाँ चुनाव महज एक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक ऐसा ‘चमत्कार’ हैं जहाँ गणित के सारे नियम फेल हो जाते हैं। हाल ही में हुए संसदीय चुनावों के नतीजे आए हैं और यकीन मानिए, किम जोंग उन ने फिर से वह कर दिखाया है जो दुनिया का कोई भी नेता सपने में भी नहीं सोच सकता— 100% मतदान और 100% समर्थन!
चुनाव या वफादारी का टेस्ट?
उत्तर कोरिया में चुनाव का मतलब वह नहीं होता जो हम समझते हैं। वहां बैलेट पेपर पर ‘पसंद’ का विकल्प नहीं होता, बल्कि सिर्फ एक नाम होता है— ‘किम जोंग उन’ या उनके द्वारा चुना गया कोई वफादार। मतदाताओं के पास दो ही रास्ते होते हैं: या तो नाम के आगे सही का निशान लगाएं, या फिर अपनी शामत बुलाएं। अगर कोई गलती से भी ‘ना’ कहने की जुर्रत करे, तो उसके लिए अलग से एक ‘काला डिब्बा’ रखा होता है, जिसमें वोट डालने का मतलब है सीधे सरकारी टॉर्चर सेल का टिकट। उत्तर कोरियाई सरकारी मीडिया के हवाले से बताया कि किम जोंग उन की वर्कर्स पार्टी और उनके सहयोगियों को 99.93 प्रतिशत वोट मिले हैं. हैरानी की बात यह है कि इस चुनाव में वोटिंग का प्रतिशत भी 99.99 रहा, यानी लगभग हर नागरिक ने वोट डाला.एक दिलचस्प डेटा यह दिया गया कि 0.07 प्रतिशत लोगों ने उम्मीदवारों के खिलाफ वोट दिया. जानकारों का कहना है कि इतने कम ‘ना’ वाले वोट सिर्फ दुनिया को यह दिखाने के लिए रखे जाते हैं कि वहां विरोध की आजादी है.
नतीजों की ‘मिर्ची’ वाली हकीकत
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टर्नआउट का रिकॉर्ड: सरकारी मीडिया ‘केसीएनए’ का दावा है कि देश के हर नागरिक ने, जो चलने-फिरने या रेंगने की स्थिति में था, वोट डाला। बीमारों के लिए ‘मोबाइल बैलेट बॉक्स’ घर-घर ले जाए गए।
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विपक्ष का ‘अकाल’: यहाँ विपक्ष नाम की प्रजाति वैसी ही दुर्लभ है जैसे रेगिस्तान में बर्फ। चुनाव में न कोई रैली हुई, न कोई भाषण, और न ही किसी ने ‘अच्छे दिन’ का वादा किया। बस आदेश आया और लोगों ने सिर झुकाकर बटन दबा दिया।
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किम की ‘लोकप्रियता’: उत्तर कोरियाई सरकार के अनुसार, किम जोंग उन की लोकप्रियता इतनी है कि वहां की हवाएं भी उनके पक्ष में चलती हैं। 100% वोट मिलना यह साबित करता है कि वहां की जनता ‘स्वेच्छा’ से (या बंदूक की नोंक पर) अपने तानाशाह को भगवान मान चुकी है।
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डेमोक्रेसी के नाम पर सख्त तानाशाही है
कहने को तो उत्तर कोरिया का पूरा नाम ‘डेमोक्रेटिक पीपल्स रिपब्लिक ऑफ कोरिया’ है, लेकिन असल में यह एक सख्त तानाशाही है. वहां हर 5 साल में चुनाव होते हैं, पर हर सीट पर सिर्फ एक ही उम्मीदवार खड़ा होता है जिसे पार्टी खुद चुनती है. लोगों के पास अपनी पसंद का कैंडिडेट चुनने का कोई ऑप्शन नहीं होता. यह चुनाव केवल जनता के अनुशासन को चेक करने और सरकारी डेटा को अपडेट करने का एक जरिया मात्र बनकर रह गया है.
उत्तर कोरिया चुनाव: विस्तार से मुख्य बिंदु
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अनिवार्य मतदान: उत्तर कोरिया में वोट डालना हर उस व्यक्ति के लिए अनिवार्य है जिसकी उम्र 17 साल से अधिक है। वोट न देना ‘देशद्रोह’ की श्रेणी में आता है।
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निगरानी: वोटिंग सेंटर पर सुरक्षा अधिकारियों की कड़ी नजर होती है। कौन मुस्कुराकर वोट दे रहा है और कौन दुखी मन से, इसका भी रिकॉर्ड रखा जाता है।
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उत्सव का माहौल: सरकारी आदेश पर वोटिंग के दिन लोगों को सड़कों पर नाचने-गाने के लिए मजबूर किया जाता है, ताकि दुनिया को दिखाया जा सके कि लोग कितने खुश हैं।
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