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बस्तर की ऐतिहासिक धरोहर: जानिए 11वीं सदी के नारायणपाल विष्णु मंदिर का इतिहास, स्थापत्य कला और प्राकृतिक सौंदर्य

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रायपुर/जगदलपुर, 31 मई 2026

छत्तीसगढ़ का बस्तर अंचल अपनी अलौकिक प्राकृतिक सुंदरता, समृद्ध जनजातीय संस्कृति और प्राचीन ऐतिहासिक धरोहरों के लिए पूरे देश में एक विशिष्ट पहचान रखता है। //आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज// घने जंगलों, कल-कल बहते जलप्रपातों और सदियों पुराने मंदिरों से समृद्ध यह क्षेत्र हर साल देश-विदेश के हजारों पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। इन्हीं ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहरों में से एक बेहद महत्वपूर्ण स्थल है—नारायणपाल विष्णु मंदिर

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बस्तर जिले के नारायणपाल गांव में स्थित यह मंदिर न केवल आस्था का एक बड़ा केंद्र है, बल्कि भारतीय स्थापत्य कला, समृद्ध इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का भी एक अनूठा उदाहरण है।

1. इंद्रावती और नारंगी नदी के संगम पर स्थित है यह पावन स्थल

नारायणपाल मंदिर की भौगोलिक स्थिति इसकी सुंदरता में चार चांद लगाती है। यह ऐतिहासिक मंदिर बस्तर की जीवनदायिनी इंद्रावती और नारंगी नदियों के पवित्र संगम के समीप स्थित है।//आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज// नदियों के संगम के कारण यहाँ का वातावरण अत्यंत शांत, मनोरम और आध्यात्मिक अनुभूति से भरा हुआ है। सुबह और शाम के समय मंदिर परिसर और नदी किनारे का नजारा पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। यहाँ प्रकृति, आस्था और इतिहास का एक ऐसा त्रिवेणी संगम देखने को मिलता है जो बस्तर में कहीं और दुर्लभ है।

2. 11वीं शताब्दी का निर्माण: चालुक्य और नागर शैली का अनूठा संगम

इतिहासकारों के अनुसार, इस भव्य मंदिर का निर्माण लगभग 11वीं शताब्दी में हुआ माना जाता है। पूरे बस्तर क्षेत्र में नारायणपाल का यह मंदिर एकमात्र प्राचीन विष्णु मंदिर है।

इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी वास्तुकला है, जिसमें दक्षिण की चालुक्य शैली और उत्तर की नागर शैली का अद्भुत और दुर्लभ समन्वय देखने को मिलता है।

  • शिखर और मंडप: मंदिर की ऊंची शिखर शैली और अष्टकोणीय (Eight-sided) मंडप इसके स्थापत्य की भव्यता को दर्शाते हैं।

  • नक्काशी: सुंदर स्तंभों और पत्थरों पर की गई बारीक व सजीव नक्काशी आज भी उतनी ही चमकीली है।

  • कलाकृतियाँ: मंदिर की दीवारों और प्रवेश द्वार पर उकेरी गई प्राचीन कलाकृतियां उस दौर के शिल्पकारों के उत्कृष्ट कला-कौशल और कठिन परिश्रम को बयां करती हैं। इतिहासकार इस मंदिर को खजुराहो कालीन स्थापत्य परंपरा का समकालीन (Contemporary) मानते हैं।

3. चित्रकोट जलप्रपात के पास होना बना पर्यटन के लिए वरदान

नारायणपाल मंदिर की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण भारत के नियाग्रा कहे जाने वाले चित्रकोट जलप्रपात के निकट होना भी है। जो भी पर्यटक चित्रकोट जलप्रपात की भव्यता को देखने आते हैं, वे इस ऐतिहासिक मंदिर का भ्रमण करना नहीं भूलते।

पर्यटकों के लिए खास: बरसात और सर्दियों के मौसम में यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य अपने चरम पर होता है। चारों ओर फैली हरी-भरी वादियों के बीच, बहती इंद्रावती नदी की लहरें और उसके तट पर शान से खड़े इस प्राचीन मंदिर की भव्यता हर किसी को अपनी ओर खींचती है। यही वजह है कि यहाँ धार्मिक श्रद्धालुओं के साथ-साथ इतिहासकार, वास्तुकला प्रेमी और फोटोग्राफी के शौकीन भी बड़ी संख्या में डेरा डालते हैं।

4. कब जाएं? (भ्रमण के लिए सबसे उपयुक्त समय)

यूं तो यहाँ सालभर पर्यटकों का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन नारायणपाल घूमने के लिए अक्टूबर से फरवरी तक का समय सबसे बेहतरीन माना जाता है।

  • शीतकाल (अक्टूबर से फरवरी): इस दौरान बस्तर का मौसम बेहद सुहावना और ठंडा रहता है, जिससे घूमना आसान हो जाता है।

  • वर्षाकाल: मानसून के दौरान इंद्रावती नदी पूरे उफान पर होती है और आसपास की हरियाली इस जगह को किसी स्वर्ग जैसा बना देती है।

5. कैसे पहुँचें नारायणपाल विष्णु मंदिर?

नारायणपाल मंदिर तक पहुँचने के लिए परिवहन के अच्छे साधन उपलब्ध हैं। यह स्थल बस्तर के जिला मुख्यालय जगदलपुर से लगभग 35 से 40 किलोमीटर की दूरी पर है।

  • सड़क मार्ग द्वारा: जगदलपुर से यह सड़क मार्ग द्वारा बेहतर तरीके से जुड़ा हुआ है। आप जगदलपुर से टैक्सी, निजी वाहन या स्थानीय बसों के माध्यम से आसानी से यहाँ पहुँच सकते हैं।

  • रेल मार्ग द्वारा: सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन जगदलपुर रेलवे स्टेशन है।

  • वायु मार्ग द्वारा: निकटतम हवाई अड्डा जगदलपुर एयरपोर्ट (माहेश्वरी एयरपोर्ट) है, जहाँ से आप आगे का सफर गाड़ी से तय कर सकते हैं।

नारायणपाल का यह प्राचीन विष्णु मंदिर महज एक ढांचा नहीं, बल्कि बस्तर के गौरवशाली अतीत का एक जीवंत दस्तावेज है, जो सदियों बाद भी भारतीय कला और संस्कृति की कहानी सुना रहा है।

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