नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में जारी भीषण जंग ने सात समंदर पार भारत की राजनीति में एक बड़ा भूचाल ला दिया है। सबसे बड़ा सस्पेंस कांग्रेस पार्टी के भीतर देखने को मिल रहा है, जहाँ पार्टी दो खेमों में बंटती नजर आ रही है। एक ओर राहुल गांधी केंद्र सरकार की ‘चुप्पी’ को लेकर हमलावर हैं, तो वहीं दूसरी ओर पार्टी के दो कद्दावर सांसदों ने मोदी सरकार के रुख का खुलकर समर्थन कर सबको हैरान कर दिया है।
राहुल गांधी का तीखा प्रहार: “मौन का मतलब हत्या का समर्थन”
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने मिडिल ईस्ट संकट पर केंद्र सरकार के रवैये की कड़ी निंदा की है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु पर प्रधानमंत्री की चुप्पी को राहुल ने बेहद गंभीर बताया है। राहुल ने यहाँ तक कह दिया कि “किसी राष्ट्राध्यक्ष की मौत पर पीएम की चुप्पी का मतलब उसकी हत्या का समर्थन करना है।” कांग्रेस का तर्क है कि इस संघर्ष से करीब एक करोड़ भारतीयों का भविष्य दांव पर लगा है और सरकार को इस पर कड़ा रुख अपनाना चाहिए।
मनीष तिवारी का ‘बम’: “यह हमारी जंग नहीं है”
राहुल गांधी के रुख से ठीक उलट, वरिष्ठ कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने सरकार के कदम को एकदम सही ठहराया है। तिवारी ने चौंकाने वाला बयान देते हुए कहा:
“मिडिल ईस्ट में भारत के 48 लाख (4.8 मिलियन) लोग रहते हैं। यह युद्ध भारत का नहीं है। हमारी ऊर्जा सुरक्षा और उर्वरक (फर्टिलाइजर) की जरूरतें इन्हीं इलाकों पर टिकी हैं। अगर सरकार सावधानी बरत रही है, तो वह बिल्कुल सही काम कर रही है।”
शशि थरूर की ‘कूटनीति’: “चुप्पी कायरता नहीं, समझदारी है”
विदेशी मामलों के जानकार और कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी अपनी ही पार्टी के आधिकारिक स्टैंड से हटकर सरकार का बचाव किया है। थरूर ने जवाहरलाल नेहरू की ‘गुटनिरपेक्षता’ की नीति का हवाला देते हुए कहा:
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संयम ही शक्ति है: चुप्पी का मतलब समर्थन नहीं होता, बल्कि यह हमारे राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने का एक तरीका है।
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दिखावा बनाम बुद्धिमानी: थरूर के अनुसार, भारत को इस समय दिखावे की राजनीति के बजाय बुद्धिमानी से आगे बढ़ने की जरूरत है, क्योंकि हमारे बहुत बड़े हित वहां दांव पर लगे हैं।
क्या कांग्रेस में बढ़ रही है दरार?
इस विरोधाभास ने राजनीतिक गलियारों में चर्चा छेड़ दी है कि क्या अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर कांग्रेस के भीतर ‘विद्वानों’ और ‘नेतृत्व’ के बीच कोई गहरी खाई बन गई है? जहाँ पार्टी नेतृत्व इसे मानवीय और नैतिक दृष्टिकोण से देख रहा है, वहीं थरूर और तिवारी जैसे नेता इसे शुद्ध रूप से भारत के आर्थिक और कूटनीतिक चश्मे से देख रहे हैं।








