अदालत की तल्ख टिप्पणी: “अपने ही दफ्तर में प्रवेश करना अपराध नहीं, व्यावसायिक विवाद को आपराधिक रंग देना गलत”
बिलासपुर/कोरबा। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने युवा भाजपा नेता और भाजयुमो के पूर्व जिला उपाध्यक्ष उमेश यादव के खिलाफ दर्ज एफआईआर को पूरी तरह निरस्त कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए इसे ‘न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग’ करार दिया और उमेश यादव को बड़ी राहत प्रदान की।
क्या था मामला?
बीती 3 सितंबर 2024 को कोरबा के सिविल लाइन थाने में उमेश यादव और उनके सहयोगियों के खिलाफ धारा 0527/2024 के तहत मामला दर्ज किया गया था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि उन्होंने “वंदे मातरम् केबल नेटवर्क” के कार्यालय में जबरन घुसकर मारपीट और लूटपाट की है।
कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि उमेश यादव लंबे समय से उक्त फर्म के वैध साझेदार (Partner) रहे हैं। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया:
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प्रवेश का अधिकार: कोई भी व्यक्ति यदि अपने ही स्वामित्व वाले या साझेदारी वाले कार्यालय में प्रवेश करता है, तो उसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
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भजनलाल प्रकरण का हवाला: सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध ‘भजनलाल मामले’ का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि यदि किसी विवाद का मूल स्वरूप नागरिक (Civil) या व्यावसायिक है, तो उसे आपराधिक रंग देना कानूनन गलत है।
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साक्ष्यों का अभाव: अदालत ने माना कि एफआईआर में लगाए गए गंभीर आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सबूत पेश नहीं किए गए, जिससे प्रतीत होता है कि यह कार्रवाई केवल दबाव बनाने के उद्देश्य से और दुर्भावना से प्रेरित थी।
राजनीतिक हलकों में चर्चा
उमेश यादव कोरबा जिले की भाजपा युवा राजनीति में एक सक्रिय चेहरा हैं। एफआईआर निरस्त होने के बाद उनके समर्थकों ने इसे सत्य की जीत बताया है। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई थी कि व्यावसायिक मतभेदों को आधार बनाकर उन्हें राजनीतिक और सामाजिक रूप से नुकसान पहुँचाने के लिए यह षड्यंत्र रचा गया था।
“साझेदार को अपने ही कार्यालय में प्रवेश करने से रोकना कानूनसम्मत नहीं है। व्यावसायिक विवादों में आपराधिक धाराएं लगाना प्रक्रिया का दुरुपयोग है।” — छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय








