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वादों की SECL खदान: कहाँ खो गया भू-विस्थापितों का हक?

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The Khatiya Khadi News Korba: विकास की वेदी पर अपनी जमीन और आजीविका की आहुति देने वाले भू-विस्थापितों के साथ वादाखिलाफी अब कोल बेल्ट की एक कड़वी सच्चाई बन गई है। गेवरा स्थित SECL महाप्रबंधक कार्यालय का हालिया घेराव केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि उस संवेदनहीनता के खिलाफ उपजा आक्रोश है, जो दशकों से फाइलों और आश्वासनों के बीच दबा हुआ है। “आप पढ़ रहे है द खटिया खड़ी न्यूज.”
पोंडी, बाहनपाठ और अमगांव के भू-विस्थापितों का यह सवाल बेहद वाजिब है कि जब अधिग्रहण की अधिसूचना एक समान है, तो मुआवजे के मापदंड अलग-अलग क्यों? 326वीं निदेशक मंडल बैठक के लाभ कुछ गांवों को देना और अन्यों को वंचित रखना न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि उन विस्थापितों के साथ घोर अन्याय है जिन्होंने कंपनी के विस्तार के लिए अपनी विरासत सौंप दी।”आप पढ़ रहे है द खटिया खड़ी न्यूज.”
दोहरे मापदंड और टूटता भरोसा SECL जैसे सार्वजनिक उपक्रमों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे ‘आदर्श नियोक्ता’ और ‘जिम्मेदार पड़ोसी’ की भूमिका निभाएंगे। लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। 14 साल का लंबा इंतजार यह बताने के लिए काफी है कि ‘वैकल्पिक रोजगार’ का वादा केवल जमीन हथियाने का एक झुनझुना बनकर रह गया है। छोटे खातेदारों को रोजगार न देना उनके अस्तित्व पर सीधा प्रहार है।”आप पढ़ रहे है द खटिया खड़ी न्यूज.”
अधिग्रहण बनाम अधिकार छत्तीसगढ़ किसान सभा और स्थानीय जनप्रतिनिधियों का यह आरोप गंभीर है कि अधिग्रहण के वक्त सुनहरे सपने दिखाए जाते हैं और बाद में नियमों की पेचीदगियों में फंसाकर भू-विस्थापितों को दर-दर भटकने पर मजबूर कर दिया जाता है। यदि प्रशासन और प्रबंधन ने 30 दिसंबर की बिलासपुर बैठक में कोई ठोस और न्यायसंगत समाधान नहीं निकाला, तो यह चिंगारी एक बड़े आंदोलन की शक्ल ले सकती है।”आप पढ़ रहे है द खटिया खड़ी न्यूज.”
SECL को समझना होगा कि विकास का पहिया विस्थापितों की आह पर नहीं, बल्कि उनके सहयोग और संतुष्टि पर घूमना चाहिए। मुआवजा और रोजगार कोई खैरात नहीं, बल्कि उन भू-विस्थापितों का संवैधानिक हक है जिनकी जमीन पर यह कंपनी लाभ का साम्राज्य खड़ा कर रही है।”आप पढ़ रहे है द खटिया खड़ी न्यूज.”

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