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यात्री आक्रोश में! कोरबा- चांपा के बीच थम जाती हैं एक्सप्रेस ट्रेनें, मालगाड़ियों को ‘VIP’ ट्रीटमेंट

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कोरबा छत्तीसगढ़, 12 दिसम्बर। सर्वाधिक राजस्व देने वाला कोरबा रेलवे स्टेशन, अधिकारियों की मनमानी और असंवेदनशीलता का शिकार बन रहा है। स्थिति यह है कि कोरबा आने वाली सभी यात्री ट्रेनों को चांपा और कोरबा के मध्य जानबूझकर रोक दिया जाता है, ताकि पहले मालगाड़ियों को निकाला जा सके। इस ‘मालगाड़ी फर्स्ट’ की नीति के कारण यात्री ट्रेनें अपने निर्धारित समय से घंटों देरी से स्टेशन पहुँच रही हैं।

हसदेव एक्सप्रेस का हाल: रात 9:45 की ट्रेन, आधी रात को आगमन

रेलवे की इस ‘दादागिरी’ से यात्री बेहाल हैं। कोरबा और रायपुर के बीच चलने वाली महत्वपूर्ण हसदेव एक्सप्रेस इसका जीता-जागता उदाहरण है। यह ट्रेन दोनों स्टेशनों से समय पर रवाना होती है, लेकिन गंतव्य तक लगभग हर रोज़ देरी से पहुँचती है। इसे रात 9:45 बजे कोरबा पहुँचना चाहिए, लेकिन यह अक्सर रात 10:30, 11:00 या कभी-कभी तो 12:00 बजे के बाद पहुँचती है।

ट्रेन चंपा तक तो सही चलती है, लेकिन इसके बाद कोरबा पहुँचने तक इसे हर छोटे-बड़े स्टेशन या आउटर पर खड़ा कर दिया जाता है। यात्रियों के सामने मालगाड़ियों को प्राथमिकता देकर निकाला जाता है। यह देखकर यात्री भड़क उठते हैं, लेकिन आक्रोशित होने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं बचता।

स्टेशन पर हंगामा: “गलती मेरी नहीं, मेरे ऊपर वालों की है!”

बीते दिन भी यही हुआ। हसदेव एक्सप्रेस एक घंटे से अधिक विलंब से स्टेशन पहुँची, जिसके बाद गुस्साए यात्रियों ने स्टेशन अधीक्षक के कक्ष में पहुँचकर जमकर बहस की। हमेशा की तरह, रेलवे अधिकारियों ने अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा, “गलती मेरी नहीं, मेरे ऊपर वालों की है।” आक्रोशित यात्री बड़बड़ाकर निकल जाते हैं और रेल व्यवस्था जस की तस बनी रहती है।

वैकल्पिक व्यवस्था के बहाने सुविधाओं में कटौती का डर

यह विडंबना है कि कोरबा को रेल सुविधाएँ दिलवाने के लिए कई आंदोलन करने पड़े, पर रेलवे अधिकारी यात्रियों को परेशान करने की अपनी ‘हरकत’ से बाज़ नहीं आए हैं। यात्रियों को परेशानी से बचने के लिए मजबूरन ट्रेन की बजाय वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ती है। अधिकारियों को यह मौका मिल जाता है कि वे ‘आय कम होने’ का बहाना बनाकर नई ट्रेनें देने से मना कर दें।

फिलहाल, कोरबा में रेल प्रबंधन के खिलाफ एक बार फिर गंभीर आक्रोश जन्म ले रहा है। यदि जल्द ही इस व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया, तो आशंका है कि यह गुस्सा जल्द ही एक उग्र आंदोलन का रूप ले सकता है और लोग विरोध स्वरूप रेल पटरियों पर उतर सकते हैं।

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