नई दिल्ली 4 अगस्त Whisky And Rum : भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने देश के शराब बाजार में एक कड़ा नियामकीय कदम उठाते हुए कई लोकप्रिय व्हिस्की और रम ब्रांडों की बिक्री पर रोक लगा दी है। FSSAI की इस कार्रवाई से भारतीय शराब उद्योग में हलचल मच गई है।

कृत्रिम फ्लेवर का इस्तेमाल बना वजह
FSSAI के अनुसार, इन ब्रांडों में प्राकृतिक तरीके से एजिंग (तैयार करने) या कच्चे माल का उपयोग करने के बजाय कृत्रिम (Artificial) या नेचर-आइडेंटिकल फ्लेवर का इस्तेमाल किया गया था। प्राधिकरण का तर्क है कि व्हिस्की या रम में इस प्रकार के फ्लेवर मिलाना वैश्विक स्तर पर वैध विनिर्माण प्रक्रिया (Manufacturing Process) नहीं है, जिससे पारंपरिक और प्राकृतिक तरीकों की अनदेखी होती है। जांच के बाद इन उत्पादों को “सब-स्टैंडर्ड” यानी निम्न गुणवत्ता की श्रेणी में रखा गया है।
3 लाख करोड़ रुपये का बड़ा बाजार
भारत दुनिया के सबसे बड़े शराब बाजारों में से एक है, जहां सालाना लगभग 40 अरब डॉलर (3 लाख करोड़ रुपये से अधिक) का कारोबार होता है। ऐसे में FSSAI का यह सख्त रुख पूरे उद्योग के लिए एक बड़ा संदेश माना जा रहा है।
प्रभावित प्रमुख ब्रांड्स
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, यह कार्रवाई मुख्य रूप से डियाजियो इंडिया (United Spirits) और इनब्रू बेवरेजेज (Inbrew Beverages) के उत्पादों पर की गई है। प्रभावित ब्रांडों में शामिल हैं:
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एंटीक्विटी ब्लू व्हिस्की (Antiquity Blue Whisky)
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रॉयल चैलेंज व्हिस्की (Royal Challenge Whisky)
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मैकडॉवेल्स नंबर 1 रम (McDowell’s No.1 Rum)
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बैगपाइपर डीलक्स व्हिस्की (Bagpiper Deluxe Whisky)
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ओल्ड कास्क डीलक्स XXX रम (Old Cask Deluxe XXX Rum)
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ओल्ड मंक (Old Monk के कुछ चुनिंदा वैरिएंट)
कंपनियों का रुख और अदालती लड़ाई
इस कार्रवाई के खिलाफ यूनाइटेड स्पिरिट्स (United Spirits) ने कड़ी आपत्ति जताई है। कंपनी का कहना है कि उसके उत्पादों के लेबल मौजूदा भारतीय नियमों के बिल्कुल अनुकूल हैं और यह सिर्फ एक कंपनी का नहीं, बल्कि पूरे उद्योग से जुड़ा हुआ मामला है। कंपनी ने अपने एक रम उत्पाद के मामले में अदालत का रुख भी किया है और व्हिस्की से जुड़े आदेशों को चुनौती देने की तैयारी कर रही है।
दूसरी ओर, FSSAI का स्पष्ट कहना है कि उसका मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य और तय मानकों के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण उत्पादों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। इस घटनाक्रम को भारत में खाद्य और पेय पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर बढ़ती नियामकीय सख्ती के रूप में देखा जा रहा है।








