मुख्य बिंदु:
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घटनास्थल: लेमरू थाना क्षेत्र के अंतर्गत ग्राम लामपहाड़ मार्ग।
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लापरवाही: रात के समय 108 एम्बुलेंस का ड्राइवर उपलब्ध नहीं था; डायल 112 भी 3 घंटे की देरी से पहुंची।
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ग्रामीणों का आक्रोश: “घायल के लिए 3 मिनट भी भारी होते हैं, यहाँ 3 घंटे में तो दशगात्र (तीजा) संपन्न हो जाता है।”
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कोरबा 9 जून । छत्तीसगढ़ का कोरबा जिला आकांक्षी और डीएमएफ (District Mineral Foundation) फंड से समृद्ध होने का दावा तो करता है, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी बेहद डरावनी है। जिले के सुदूर वनांचल क्षेत्रों में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव एक बार फिर एक ग्रामीण की मौत का कारण बन गया। लेमरू थाना क्षेत्र में सड़क हादसे का शिकार हुआ एक गंभीर रूप से घायल ग्रामीण करीब 3 घंटे तक तड़पता रहा, लेकिन उसे न तो समय पर 108 आपातकालीन एम्बुलेंस मिली और न ही डायल 112 की मदद। अंततः इलाज के अभाव में उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया।
सिर पर आई थी गंभीर चोट, बाइक पर ले जाना नहीं था मुमकिन
यह दर्दनाक वाकया 8 जून की रात करीब 7 बजे का है। ग्राम अखराडाड का निवासी एक ग्रामीण लामपहाड़ मार्ग से बाइक पर गुजर रहा था, तभी वह सड़क हादसे का शिकार हो गया। सिर पर गंभीर चोट आने के कारण वह मौके पर ही बेहोश हो गया। आधे घंटे बाद (करीब 7:30 बजे) जब स्थानीय ग्रामीणों को इसकी भनक लगी, तो वे तुरंत मदद के लिए दौड़े। ग्रामीण की हालत इतनी नाजुक थी कि उसे बाइक पर बैठाकर अस्पताल ले जाना असंभव था; उसे तत्काल इमरजेंसी लाइफ सपोर्ट (एम्बुलेंस) की जरूरत थी।
एम्बुलेंस का ड्राइवर घर जा चुका था, 3 घंटे बाद पहुंची 112
हताश ग्रामीणों ने जब प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) लेमरू के प्रभारी बी.डी. नायक से संपर्क किया, तो बेहद गैर-जिम्मेदाराना जवाब मिला कि “108 एम्बुलेंस का ड्राइवर माइकल अपने घर जा चुका है।” इसके बाद ग्रामीणों ने आपातकालीन सेवा डायल 112 को फोन घुमाया। लेकिन सिस्टम की सुस्ती का आलम देखिए कि डायल 112 की टीम को मौके पर पहुंचने में पूरे 3 घंटे लग गए। जब तक मदद पहुंची, तब तक घायल ग्रामीण के प्राण पखेरू उड़ चुके थे।
“3 घंटे में तो दशगात्र संपन्न हो जाता है…” व्यवस्था की इस कड़वी हकीकत से मर्माहत और आक्रोशित ग्रामीणों ने कहा, “ऐसी गंभीर स्थिति में घायल के लिए 3 मिनट भी घातक सिद्ध होते हैं। यहाँ तो व्यवस्था ने 3 घंटे लगा दिए, इतने समय में तो इंसान का दशगात्र कार्यक्रम संपन्न हो जाता है।”
ग्रामीणों की मांग: चौबीस घंटे उपलब्ध रहें ड्राइवर और EMT
स्थानीय निवासियों का कहना है कि लेमरू क्षेत्र में 108 एम्बुलेंस की सेवा केवल दिन के भरोसे चल रही है। रात के लिए यहाँ न तो पर्याप्त ड्राइवर हैं और न ही इमरजेंसी मेडिकल टेक्निशियन (EMT)। दिन में ड्यूटी करने वाले कर्मचारी के घर जाने के बाद पूरा वनांचल भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है। ग्रामीणों ने मांग की है कि इस क्षेत्र में 24 घंटे शिफ्ट के अनुसार ड्राइवरों की तैनाती की जाए ताकि किसी और को अपनी जान न गंवानी पड़े।
बड़ा सवाल: क्या तय होगी किसी की जिम्मेदारी?
इस दर्दनाक हादसे ने प्रशासनिक दावों की पोल खोल कर रख दी है।
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आखिर करोड़ों रुपये के DMF फंड वाले जिले के वनांचल आज भी एम्बुलेंस जैसी बुनियादी सुविधा के लिए क्यों तरस रहे हैं?
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आपातकालीन सेवाओं की इस सुस्ती और घोर लापरवाही के लिए क्या किसी अधिकारी या कर्मचारी की जवाबदेही तय होगी?
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चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करने वाले क्षेत्रीय नेता ऐसी गंभीर असुविधाओं को दूर करने के लिए सक्रिय क्यों नहीं होते?
सवाल आज भी जस का तस कायम है और ग्रामीण इस इंतजार में हैं कि क्या इस मौत के बाद सिस्टम की नींद टूटेगी या ढर्रा यूँ ही चलता रहेगा?








