नई दिल्ली/ कोलकाता 27 अप्रैल 2026 :
भारतीय राजनीति में कभी मंदिर, कभी गरीबी तो कभी विकास पर चर्चा होती थी, लेकिन चुनाव 2026 के इस दौर में अब ‘मछली’ चुनावी अखाड़े के केंद्र में आ गई है। पश्चिम बंगाल में चुनावी रैलियों में अब विकास के दावों से ज्यादा इस बात पर बहस हो रही है कि किसकी थाली में कौन सी मछली होगी और किसके राज में मछली भात पर खतरा मंडराएगा।
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रवि किशन का ‘फिश-प्लान’ और 4 मई का वादा
बीजेपी सांसद और भोजपुरी सुपरस्टार रवि किशन ने इस विवाद में नया तड़का लगा दिया है। उन्होंने विपक्ष पर हमला बोलते हुए एक ऐसा बयान दिया जिसने सोशल मीडिया से लेकर गलियारों तक हलचल मचा दी है। रवि किशन ने खुले मंच से कहा:
“4 मई के बाद 4 गुना मछली खाइए, कोई दिक्कत नहीं है। हम लोग भांति-भांति की मछली यहाँ लेकर आएंगे। जहाँ-जहाँ NDA की सरकार है, वहाँ की मछलियों को बंगाल के कुएं-तालाबों में डालेंगे।”
रवि किशन का यह बयान सीधे तौर पर उन आरोपों का जवाब माना जा रहा है, जिसमें विपक्ष बीजेपी पर खान-पान की आज़ादी छीनने का आरोप लगा रहा है। ‘4 गुना मछली’ का जुमला अब सियासी गलियारों में बीजेपी के नए ‘मेनू कार्ड’ के तौर पर देखा जा रहा है।
ममता का पलटवार: “छीन लेंगे मछली-भात”
दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे अस्मिता की लड़ाई बना दिया है। ममता का दावा है कि अगर बीजेपी सत्ता में आई तो बंगालियों का पारंपरिक ‘मछली-भात’ बंद करवा दिया जाएगा। टीएमसी इस मुद्दे को ‘बंगाली संस्कृति बनाम बाहरी संस्कृति’ के रूप में पेश कर रही है।
मछली पर ‘महा-संग्राम’: क्यों छिड़ी है जंग?
बीजेपी के दिग्गज नेता भी इस ‘मछली प्रेम’ की रेस में पीछे नहीं हैं। कुछ दिनों पहले अनुराग ठाकुर का मछली खाते हुए वीडियो सामने आया, जिसे विपक्ष ने ‘चुनावी स्टंट’ करार दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि:
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वोट बैंक की इंजीनियरिंग: बंगाल और यूपी के कुछ हिस्सों में मछली एक बड़ा आहार है। इसे मुद्दा बनाकर नेता सीधे तौर पर मध्यम वर्ग और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को साध रहे हैं।
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आरोप-प्रत्यारोप का खेल: विपक्ष इसे ‘भोजन की स्वतंत्रता’ से जोड़ रहा है, जबकि सत्ता पक्ष इसे ‘सांस्कृतिक आदान-प्रदान’ और ‘सस्ती मछली’ के वादे के तौर पर पेश कर रहा है।
क्या जनता का स्वाद बदलेगा वोट का रुख?
अब सवाल यह है कि क्या जनता रोटी-कपड़ा-मकान को छोड़कर ‘मछली’ के आधार पर बटन दबाएगी? जहाँ रवि किशन ‘4 मई के बाद’ नई मछलियों की खेप लाने का सपना दिखा रहे हैं, वहीं विपक्ष ‘थाली बचाने’ की दुहाई दे रहा है। तालाबों में मचने वाली यह सियासी हलचल आने वाले चुनाव परिणामों में कितनी ‘बड़ी मछली’ फंसा पाती है, यह देखना दिलचस्प होगा।







