छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले से जो खबर आई है, उसने न केवल प्रशासनिक मर्यादाओं को तार-तार किया है, बल्कि लोकतंत्र के उस चौथे स्तंभ और आम आदमी के विश्वास को भी गहरी चोट पहुंचाई है, जो यह मानता है कि ‘कानून सबके लिए बराबर है’। तमनार क्षेत्र में अवैध उत्खनन की जांच करने निकली एसडीएम (SDM) और नायब तहसीलदार की टीम ने जो किया, वह किसी भी सभ्य समाज में ‘कानून की रक्षा’ नहीं बल्कि ‘सत्ता प्रायोजित गुंडागर्दी’ की श्रेणी में आता है।
जांच का बहाना, क्रूरता का निशाना
अवैध उत्खनन रोकना शासन का दायित्व है, लेकिन क्या इस प्रक्रिया में किसी ग्रामीण की जान लेना भी उसी ‘प्रोटीन’ का हिस्सा है? 14 फरवरी की उस दोपहर जब राजस्व का अमला भारी-भरकम लवाजमे के साथ पहुंचा, तो उम्मीद थी कि वहां अवैध खनन करने वालों पर कानूनी शिकंजा कसा जाएगा। लेकिन इसके उलट, वहां मौजूद एक निहत्थे ग्रामीण के साथ जिस तरह की मारपीट के आरोप लग रहे हैं, उसने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कालिख पोत दी है। सवाल यह है कि क्या अब कलम चलाने वाले हाथ लाठियों से फैसला करेंगे?
कुर्सी का मद और बेबस की सांसें
एसडीएम और तहसीलदार जैसे पद जिम्मेदारी और संयम के प्रतीक होते हैं। लेकिन रायगढ़ की इस घटना ने दिखाया कि कैसे कुर्सी का अहंकार सिर चढ़कर बोल रहा है। चश्मदीदों और परिजनों का विलाप चीख-चीख कर कह रहा है कि ‘साहब’ ने कानून की किताबों को ताक पर रखकर खुद ही जज और जल्लाद बनने का फैसला कर लिया। एक गरीब ग्रामीण की मौत महज एक ‘आंकड़ा’ नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था की हत्या है जिसे हम ‘लोकतांत्रिक प्रशासन’ कहते हैं।
पोस्टमार्टम की आड़ में रफा-दफा का खेल?
अक्सर ऐसी घटनाओं के बाद प्रशासन का घिसा-पिटा तर्क आता है— “मामले की जांच जारी है, पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार करें।” लेकिन क्या कोई भी रिपोर्ट उस दहशत को मिटा पाएगी जो उस समय वहां मौजूद ग्रामीणों ने महसूस की? क्या कोई कागजी सफाई उस परिवार के आंसू पोंछ पाएगी जिसने अपने मुखिया को खो दिया? जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो जनता न्याय की गुहार किससे लगाए?
अब ‘इंसाफ’ की बारी
यह समय केवल शोक मनाने का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है। ग्रामीणों की मांग के तीखे सवाल.. ▪️क्या शासन इन अधिकारियों के खिलाफ धारा 302 (हत्या) के तहत मामला दर्ज करने का साहस दिखाएगा?▪️क्या उन्हें सिर्फ ‘लाइन अटैच’ या ‘निलंबित’ करके मामला ठंडा कर दिया जाएगा?▪️क्या प्रदेश की सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि भविष्य में कोई ‘साहब’ किसी गरीब की अर्थी सजाने का कारण न बने?
रायगढ़ का यह ‘खूनी रविवार’ लंबे समय तक याद रखा जाएगा। यह याद दिलाएगा कि जब रक्षक अपनी मर्यादा भूलते हैं, तो समाज में विद्रोह पनपता है। मुख्यमंत्री और गृहमंत्री को यह समझना होगा कि जनता ‘सुशासन’ चाहती है, ‘डंडा शासन’ नहीं।









