रायगढ़, छत्तीसगढ़ 2 जनवरी 2026| विशेष संवाददाता रायगढ़ के तमनार (गारे पेलमा सेक्टर-1) में जिंदल उद्योग की जनसुनवाई के दौरान जो हुआ, उसने न केवल प्रशासनिक संवेदनशीलता की कलई खोल दी है, बल्कि हमारी सामाजिक नैतिकता के पतन का एक भयावह अध्याय भी लिख दिया है।
वह चीख जो सिस्टम को सुनाई नहीं दी
27 दिसंबर को हुई इस घटना का वायरल वीडियो रूह कंपा देने वाला है। वीडियो में प्रदर्शनकारियों की भीड़ एक महिला पुलिसकर्मी को जमीन पर बेरहमी से घसीटती और अमानवीय व्यवहार करती दिख रही है। वर्दी में तैनात उस महिला की बेबसी का आलम यह था कि वह चिल्लाती रही—“मैं यहाँ की नहीं हूँ, मुझे बाहर से बुलाया गया है”—लेकिन न तो भीड़ का दिल पसीजा और न ही मौके पर मौजूद भारी भरकम बल उसे समय रहते बचा सका।
प्रशासनिक विफलता: सच दबाने की नाकाम कोशिश
जब यह नया वीडियो तेजी से वायरल हुआ तब प्रशासन की आंख खुली । जब पुलिस महकमे की ही महिला कर्मियों में आक्रोश भड़का, तब जाकर कागजी घोड़े दौड़ाए गए। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन के लिए एक महिला के सम्मान से ज्यादा महत्वपूर्ण उद्योगपतियों के प्रोजेक्ट की साख बचाना था?
गठबंधन और जलती जमीन
तमनार का यह आक्रोश अचानक नहीं भड़का है। यह सालों से ‘जल-जंगल-जमीन’ की लूट और विकास के नाम पर आदिवासियों के अधिकारों को कुचलने का नतीजा है। आरोप लग रहे हैं कि सरकारें जनता के हितों की रक्षक बनने के बजाय कॉर्पोरेट घरानों के ‘एजेंट’ के रूप में काम कर रही हैं। जब राजतंत्र और धनतंत्र की अनैतिक जुगलबंदी आदिवासियों की माटी छीनने पर आमादा हो, तो ऐसे ही आत्मघाती टकराव जन्म लेते हैं।
विकास किसका? विनाश किसका?
यह घटना एक कड़वी चेतावनी है। छत्तीसगढ़ को आज ऐसे ‘समावेशी विकास’ की जरूरत है जिसकी नीतियां वातानुकूलित कमरों में नहीं, बल्कि खेतों की धड़कन सुनकर बनाई जाएं। अगर विकास का केंद्र ‘इंसान’ के बजाय केवल ‘कोयला और मुनाफा’ होगा, तो सामाजिक ताना-बाना ऐसे ही बिखरता रहेगा।








