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ऊर्जाधानी की ‘राख’ में घी डालते CSEB के अफसर: टेंडर है या प्रसाद, जो बस ‘अपनों’ में बँट रहा है?

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[कोरबा विशेष]

कहते हैं कोयला जलता है तो राख बनती है, लेकिन कोरबा CSEB में तो राख के साथ-साथ ‘पारदर्शिता’ भी जलकर स्वाहा हो गई है। यहाँ के सिविल विभाग में इन दिनों एक नया खेल चल रहा है, जिसका नाम है— “तुम मेरा ख्याल रखो , मैं तुम्हें टेंडर दूँगा।”

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‘विनय’ पूर्वक बंदरबांट!

शिकायत की पोटली लेकर घूम रहे श्रेया सेल्स कॉरपोरेशन का आरोप है कि कार्यपालन यंत्री विनय सोनी जी ने टेंडर प्रपत्रों को अपनी निजी संपत्ति समझ लिया है। आरोप तो यहाँ तक हैं कि टेंडर फॉर्म सबको नहीं, बल्कि सिर्फ उन्हीं ‘खास’ ठेकेदारों को दिए जा रहे हैं जिनकी कुंडली अधिकारियों की ‘गुड बुक’ में फिट बैठती है।

बाकी ठेकेदार तो बस विभाग की सीढ़ियाँ गिनने और अधिकारियों की मुस्कुराहट देखने के लिए रजिस्टर्ड हुए हैं।

टेंडर नहीं, ‘शादी का न्योता’ है!

विभागीय कार्यप्रणाली को देखकर ऐसा लगता है जैसे टेंडर की प्रक्रिया कोई सरकारी नियम न होकर किसी निजी शादी का न्योता हो— “बुलाया उसी को जाएगा, जो अपना होगा।” * राख परिवहन के नाम पर जो ‘रेवड़ी’ बँट रही है, उसकी मिठास सिर्फ कुछ चहेते ठेकेदारों के हलक तक ही पहुँच पा रही है।

  • बाकी बेचारे ठेकेदार ‘भुगतान की देरी’ का व्रत रखकर सिस्टम की लंबी उम्र की दुआ मांग रहे हैं।

कलेक्टर की चौखट पर ‘इंसाफ’ की उम्मीद

जब विभाग के ‘इंजीनियरिंग दिमाग’ ने ठेकेदारों का तेल निकाल दिया, तो मामला कलेक्टर साहब की चौखट तक पहुँच गया है। आवेदन में बड़े ही प्यार से चेतावनी दी गई है कि अगर ये ‘राख का खेल’ बंद नहीं हुआ, तो कोर्ट-कचहरी के चक्कर में अधिकारियों की कुर्सी की ‘धूल’ झाड़ी जाएगी।

अब देखना यह है कि प्रशासन इस ‘सिस्टम की राख’ को साफ करता है या फिर अधिकारियों की इस ‘मनमर्जी की धूप’ में भ्रष्टाचार के और भी फूल खिलेंगे।


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