कोरबा: हसदेव ताप विद्युत संयंत्र (HTPP) कोरबा पश्चिम के प्रबंधन की घोर लापरवाही एक बार फिर आम जनता और पर्यावरण पर भारी पड़ गई है। ग्राम झाबू स्थित राखड़ बांध (Ash Dyke) के सोमवार को अचानक टूट जाने से क्षेत्र में राख मिश्रित जहरीले पानी का सैलाब उमड़ पड़ा। यह राख न केवल उपजाऊ जमीनों पर बिछ गई है, बल्कि इसके जीवनदायिनी हसदेव नदी में समाहित होने का गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
हादसा या जानबूझकर की गई साजिश?
स्थानीय ग्रामीणों ने इस आपदा के पीछे एक चौंकाने वाला आरोप लगाया है। बताया जा रहा है कि चार दिन पहले बांध की ऊंचाई बढ़ाने के काम में लगा एक भारी वाहन अनियंत्रित होकर राखड़ बांध में गिर गया था। वाहन को निकालने के लिए ठेकेदार ने सुरक्षा नियमों को ताक पर रखकर कथित तौर पर बांध के तटबंध को ही तोड़ दिया। इसके बाद मलबे और राख का बहाव अनियंत्रित हो गया और देखते ही देखते तटबंध का एक बड़ा हिस्सा बह गया।
आधा दर्जन से अधिक गांव ‘सफेद जहर’ की चपेट में
गर्मी की शुरुआत के साथ ही इस राख ने झाबू, नवागांव, पुरैनाखार, धनरास, लोतलोता, चारपारा, मड़वामहुआ और ढांडपारा जैसे गांवों की नींद उड़ा दी है। जैसे-जैसे धूप तेज होगी, यह गीली राख सूखकर हवा में घुलेगी, जिससे लोगों का सांस लेना, खाना और रहना दूषित हो जाएगा।
दो महीने में दूसरी बार फूटा बांध
हैरानी की बात यह है कि एचटीपीपी के राखड़ बांध में यह कोई पहली घटना नहीं है। महज दो माह पहले भी बांध फूटने से राख हसदेव नदी के रास्ते किसानों के खेतों तक जा पहुंची थी। बार-बार हो रहे इन हादसों के बावजूद प्रबंधन केवल ‘लीपा-पोती’ में जुटा है।
अधिकारियों का गैर-जिम्मेदाराना रवैया
जब इस तबाही के बारे में सिविल विभाग के अतिरिक्त मुख्य अभियंता शरद चंद्र पाठक से संपर्क करने की कोशिश की गई, तो उन्होंने फोन उठाना तक मुनासिब नहीं समझा। वहीं, कार्यपालन अभियंता नारायण पटेल ने इसे महज ‘ओवरफ्लो’ बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की है, जबकि धरातल पर तबाही का मंजर कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है।
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