मुंबई/अंबरनाथ/अकोट: महाराष्ट्र के हालिया निकाय चुनावों के नतीजों ने राज्य की राजनीति में एक नया और विवादास्पद अध्याय जोड़ दिया है। अंबरनाथ और अकोट नगर परिषद में सत्ता हासिल करने के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपनी धुर विरोधी विचारधारा वाली पार्टियों—कांग्रेस और AIMIM—के साथ हाथ मिलाकर सबको चौंका दिया है। इन ‘अपवित्र’ गठबंधनों ने न केवल सहयोगियों को नाराज किया है, बल्कि प्रदेश नेतृत्व को भी रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है।
अंबरनाथ: शिवसेना (शिंदे) को पछाड़कर BJP-कांग्रेस का ‘अजीब’ मेल
अंबरनाथ नगर परिषद में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना को सत्ता से बाहर होना पड़ा है। यहां BJP (14 सीटें) ने कांग्रेस (12 सीटें) और अजित पवार गुट की NCP के साथ मिलकर ‘अंबरनाथ विकास आघाड़ी’ का गठन किया और बहुमत हासिल कर लिया।
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परिणाम: शिवसेना की 27 सीटें धरी की धरी रह गईं।
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प्रतिक्रिया: कांग्रेस ने अनुशासनहीनता के आरोप में अपने सभी 12 पार्षदों को निलंबित कर दिया है।
अकोट: BJP और AIMIM आए साथ, माया धुले बनीं नगराध्यक्ष
अकोला जिले की अकोट नगर परिषद में समीकरण और भी हैरान करने वाले रहे। यहाँ 11 सीटें जीतने वाली BJP ने बहुमत (15) के लिए ओवैसी की पार्टी AIMIM के पार्षदों का समर्थन लेकर ‘अकोट विकास मंच’ बनाया।
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नतीजा: AIMIM के 4-5 पार्षदों और अन्य छोटे दलों के सहयोग से BJP की माया धुले नगराध्यक्ष चुनी गईं। हालांकि, AIMIM के आधिकारिक नेतृत्व ने गठबंधन से इनकार किया है, लेकिन धरातल पर स्थानीय पार्षदों ने BJP को समर्थन दिया।
फडणवीस की सख्त चेतावनी: “गठबंधन स्वीकार्य नहीं”
इन स्थानीय गठबंधनों पर मचे बवाल के बाद उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सख्त रुख अख्तियार किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस या AIMIM के साथ किसी भी स्तर पर गठबंधन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। फडणवीस ने इसे स्थानीय नेताओं की मनमानी करार देते हुए अनुशासनात्मक कार्रवाई करने और तुरंत गठबंधन तोड़ने के निर्देश जारी किए हैं।
विपक्ष का हमला: “बंटेंगे तो कटेंगे” के नारे पर सवाल
शिवसेना (UBT) नेता संजय राउत ने इस अवसर पर BJP को आड़े हाथों लिया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ और ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ की बातें करने वाली BJP सत्ता के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। राउत ने इसे BJP का दोहरा चेहरा और विचारधारा का पतन बताया।
दिसंबर 2025 के इन निकाय चुनावों ने स्पष्ट कर दिया है कि स्थानीय स्तर पर सत्ता की भूख अक्सर राष्ट्रीय विचारधाराओं पर भारी पड़ती है। अब देखना यह है कि क्या प्रदेश नेतृत्व इन गठबंधनों को तोड़कर अपनी साख बचा पाता है या नहीं।








