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सोमनाथ: भारत की अजेय जिजीविषा का प्रतीक—पीएम मोदी ने 75वें लोकार्पण दिवस पर साझा किए भावुक विचार

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नई दिल्ली 9 मई: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आगामी 11 मई को अपनी सोमनाथ यात्रा से पूर्व एक विशेष संपादकीय लेख के माध्यम से देशवासियों के साथ अपनी भावनाएं साझा की हैं। यह लेख न केवल सोमनाथ मंदिर के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करता है, बल्कि भारत की सभ्यतागत महानता और उसके अटूट संकल्प की गाथा भी कहता है।आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज।


लेख का मुख्य विषय: 11 मई का चिरस्थायी महत्व

प्रधानमंत्री ने अपने लेख में इस बात पर जोर दिया है कि 11 मई की तिथि भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। 75 वर्ष पूर्व, इसी दिन स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर का लोकार्पण किया था। प्रधानमंत्री के अनुसार, यह केवल एक मंदिर का पुनर्निर्माण नहीं था, बल्कि भारत के आत्मविश्वास और सांस्कृतिक गौरव के पुनरुत्थान का प्रतीक था।आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज।

वीर पूर्वजों को श्रद्धांजलि

पीएम मोदी ने उन अनगिनत लोगों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की, जिन्होंने सदियों तक विदेशी आक्रांताओं के हमलों को झेला, लेकिन सोमनाथ की गरिमा को झुकने नहीं दिया। उन्होंने लिखा:

“मैंने उन सभी लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित की है जिन्होंने हर तरह की चुनौतियों का सामना करते हुए भी सोमनाथ की रक्षा की और उसकी गरिमा को बहाल किया।”

समाचार के प्रमुख बिंदु:

  • 75वीं वर्षगांठ का उत्सव: 11 मई को सोमनाथ मंदिर के लोकार्पण के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं, जिसे प्रधानमंत्री एक ऐतिहासिक मील का पत्थर मानते हैं।

  • पीढ़ियों का संघर्ष: लेख में इस बात का उल्लेख है कि कैसे कई पीढ़ियों ने इस पावन स्थल के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए निरंतर संघर्ष किया।

  • अजेय भारत की भावना: प्रधानमंत्री ने सोमनाथ को ‘भारत की अजेय भावना’ (Unconquerable Spirit) का केंद्र बताया है, जो विनाश के बाद भी बार-बार सृजन की शक्ति रखता है।

  • सोशल मीडिया पर साझा किया संदेश: पीएम ने ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर लेख का लिंक साझा करते हुए इसे देशवासियों के नाम एक पत्र की संज्ञा दी है।

निष्कर्ष

प्रधानमंत्री की यह यात्रा और उनका लेख वर्तमान पीढ़ी को भारत की समृद्ध विरासत और संघर्षपूर्ण इतिहास से जोड़ने का एक प्रयास है। सोमनाथ मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि सत्य और श्रद्धा को कोई भी शक्ति मिटा नहीं सकती।

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