Latest News
INDIA Bloc Meeting: दिल्ली में विपक्षी दिग्गजों का महामंथन, लेकिन AAP और DMK ने बनाई दूरी; सोमनाथ भारती ने कांग्रेस पर बोला तीखा हमला देश में शिक्षा का ‘बाजारीकरण’? 10 साल में बंद हुए 94,000 सरकारी स्कूल, प्राइवेट का बढ़ा ग्राफ; नीति आयोग की रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा शिव नगर रूमगरा में भव्य सम्मान समारोह: मुख्य अतिथि नरेंद्र देवांगन ने कहा— ‘सेवा, संगठन और संस्कारों से ही होगी समाज की उन्नति’ ‘पुष्पा’ का द एंड! नेपाल बॉर्डर से धरा गया TMC का ‘दबंग’ जहांगीर खान, शुभेंदु के खौफ से छोड़ा था मैदान मुंबई एयरपोर्ट पर DRI का बड़ा एक्शन: ‘ऑपरेशन गोल्डन नेक्सस’ में 5 करोड़ का सोना ज़ब्त, इंटरनेशनल सिंडिकेट के 7 सदस्य गिरफ्तार साय कैबिनेट की महाबैठक कल: 5 लाख सरकारी कर्मचारियों को मिल सकती है कैशलेस इलाज की ‘महा-सौगात’!
Home » कोरबा » “वाह रे वन विभाग! तालाब ऐसे बनाए कि पानी भी रास्ता भूल गया, अब प्यासे जानवर रिहायशी इलाकों में मांग रहे ‘इंसाफ’!”

“वाह रे वन विभाग! तालाब ऐसे बनाए कि पानी भी रास्ता भूल गया, अब प्यासे जानवर रिहायशी इलाकों में मांग रहे ‘इंसाफ’!”

Share:

कोरबा 19 अप्रैल 2026। इसे कुदरत का करिश्मा कहें या वन विभाग की ‘इंजीनियरिंग’ का कमाल, कि कोरबा के मड़वारानी जंगलों में बने तालाबों को देखकर अब रेगिस्तान के ऊंटों को भी अपने भविष्य की चिंता होने लगी है। (आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज) विभाग ने जंगल में वन्य प्राणियों की प्यास बुझाने के लिए ऐसी शानदार संरचनाएं खड़ी की हैं, जिन्हें देखकर प्यास बुझना तो दूर, खुद पानी भी अपना रास्ता भूल गया है।

Advt

फाइलों में ‘बाढ़’, जमीन पर ‘अकाल’

करतला रेंज के अंतर्गत आने वाले मड़वारानी इलाके में पिछले सालों में कागजों पर पानी की ऐसी ‘लहर’ दौड़ाई गई कि लगा अब जानवरों को ‘स्विमिंग पूल’ की सुविधा मिलेगी।(आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज) दावा था कि ये पौंड साल भर लबालब रहेंगे। लेकिन वास्तविकता यह है कि इन ढांचों ने ठंड से लेकर अब तक पानी की एक बूंद नहीं देखी। शायद विभाग ने इन्हें ‘वाटर हार्वेस्टिंग’ के बजाय ‘धूल हार्वेस्टिंग’ के लिए बनाया है।

मौत का ‘इवेंट मैनेजमेंट’

जब जंगल में गले सूखने लगते हैं, तो बेबस वन्य प्राणी रिहायशी इलाकों की ओर रुख करते हैं। यहाँ उनका स्वागत करने के लिए विभाग के ‘अघोषित बॉडीगार्ड्स’ (कुत्तों के झुंड) तैनात रहते हैं।(आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज) प्यासे चीतलों को पानी तो नहीं मिलता, लेकिन कुत्तों के दांत और तेज रफ्तार गाड़ियाँ उन्हें ‘इंसाफ’ जरूर दिला देती हैं। मड़वारानी, खरहरी और बरपाली के जंगलों से आए दिन वन्य जीवों की लाशें उठ रही हैं, लेकिन विभाग इसे ‘प्राकृतिक प्रक्रिया’ मानकर चैन की नींद सो रहा है।

करोड़ों का खेल और खदान का ‘प्रसाद’

SECL की मानिकपुर खदान के लिए 194.728 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन के बदले जो भारी-भरकम बजट मिला, वह कक्ष क्रमांक P-1165 और P-1164 की बोरिंग और सासर पीट में कहीं ‘दफन’ हो गया है। 2024-25 की इस परियोजना में कागजों पर तो बोर खनन और वाटर सप्लाई का काम जोर-शोर से चल रहा है, लेकिन धरातल पर जानवर अब भी ‘वाटर फिल्टर’ की नहीं, बस दो बूंद जिंदगी की तलाश में हैं।

निष्कर्ष: अधिकारियों ने इन कार्यों की जांच करना इसलिए उचित नहीं समझा, क्योंकि शायद उन्हें डर है कि कहीं फाइलों से निकला पानी दफ्तर न डुबो दे। फिलहाल, जंगल के जानवर रिहायशी इलाकों में आकर अपनी जान देकर विभाग की विफलता का सर्टिफिकेट बांट रहे हैं।


।।।

Leave a Comment