नई दिल्ली 8 जून : देश के भीतर हाल के दिनों में एक के बाद एक सामने आई पेपर लीक की घटनाओं ने भारत की शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आम जनता से लेकर विशेषज्ञों के बीच यह चिंता लगातार बढ़ रही है कि शिक्षा के तेजी से होते बाजारीकरण के कारण ही परीक्षाओं में गड़बड़ी और धांधली के मामले बढ़ रहे हैं। (आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज) इस बीच, संसद से लेकर नीति आयोग की हालिया रिपोर्टों में देश के स्कूली ढांचे को लेकर एक ऐसा चौंकाने वाला सच सामने आया है, जो सरकारी शिक्षा व्यवस्था की सेहत पर बड़े सवाल खड़े करता है।
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सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक (2014-15 से 2024-25) के दौरान देश में सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के संतुलन में एक बड़ा फेरबदल देखने को मिला है। (आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज) जहां एक तरफ हजारों सरकारी स्कूलों पर ताला लटक गया है या उन्हें आपस में मर्ज (विलय) कर दिया गया है, वहीं दूसरी तरफ प्राइवेट स्कूलों का जाल तेजी से फैला है।
आंकड़े बोलते हैं: 10 साल में सरकारी स्कूल 8% घटे, प्राइवेट 15% बढ़े
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा लोकसभा में दी गई जानकारी और नीति आयोग की लेटेस्ट रिपोर्ट ‘स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया’ के आंकड़े देश की बदलती शिक्षा व्यवस्था की गवाही दे रहे हैं:
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सरकारी स्कूलों में गिरावट: वर्ष 2014-15 में देश में सरकारी स्कूलों की कुल संख्या 11,07,101 थी, जो वर्ष 2024-25 तक घटकर लगभग 10,13,000 रह गई है। यानी पिछले 10 सालों में देश भर से करीब 94,000 सरकारी स्कूल कम हो गए हैं (8% की गिरावट)।
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प्राइवेट स्कूलों में उछाल: इसके ठीक विपरीत, इसी अवधि के दौरान प्राइवेट स्कूलों की संख्या 2.88 लाख से बढ़कर 3.39 लाख हो गई है, जो लगभग 14.9% की भारी बढ़ोतरी को दर्शाता है।
किन राज्यों पर पड़ा सबसे ज्यादा असर? एमपी-यूपी अव्वल
सरकारी स्कूलों के बंद होने या विलय (Merge) होने की इस रफ्तार में देश के दो सबसे बड़े राज्य—मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश—सबसे आगे रहे हैं। (आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज) देश भर में कुल बंद हुए स्कूलों में से 60.9% स्कूल अकेले इन दो राज्यों से हैं।
1. मध्य प्रदेश (गिरावट में सबसे आगे)
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एमपी में सरकारी स्कूलों की संख्या में 24.1% की भारी कटौती दर्ज की गई है।
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यहाँ 2014-15 के 1,21,849 स्कूलों की तुलना में अब केवल 92,439 स्कूल बचे हैं, यानी सीधे तौर पर 29,410 सरकारी स्कूल कम हुए हैं।
2. उत्तर प्रदेश (स्कूल घटे भी, प्राइवेट बढ़े भी)
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यूपी में सरकारी स्कूलों की संख्या 1,62,228 से घटकर 1,37,102 रह गई है, जो 25,126 स्कूलों की कमी को उजागर करता है।
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हालांकि, इसी दौरान उत्तर प्रदेश में देश के सबसे ज्यादा यानी 19,305 नए प्राइवेट स्कूल भी खुले हैं।
अन्य राज्यों का हाल:
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ओड़िशा: सरकारी स्कूलों में 17.1% की कमी।
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अरुणाचल प्रदेश: 16.4% की कमी।
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झारखंड: 13.4% की गिरावट।
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बिहार (अपवाद): इस विपरीत लहर के बीच बिहार में सरकारी स्कूलों की संख्या में 5% की बढ़ोतरी देखी गई है, जो 74,291 से बढ़कर 78,120 हो गई है। हालांकि, बिहार के कई इलाकों में आज भी प्राथमिक स्कूलों की भारी कमी बनी हुई है।
आखिर क्यों बंद या कम हो रहे हैं सरकारी स्कूल?
सरकार और नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, इस बदलाव के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण हैं:
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स्कूल मर्जर पॉलिसी (School Merger Policy): राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) और अन्य प्रशासनिक सुधारों के तहत, कम दूरी पर स्थित और कम छात्रों वाले छोटे स्कूलों को पास के बड़े एकीकृत (Integrated) स्कूलों में मिला दिया गया है। सरकार का तर्क है कि इससे संसाधनों और शिक्षकों का बेहतर इस्तेमाल हो सकेगा।
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जीरो एनरोलमेंट (शून्य छात्र संख्या): देश के 5,149 सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जहाँ वर्तमान में एक भी छात्र नामांकित नहीं है। इनमें से 70% से अधिक स्कूल केवल तेलंगाना और पश्चिम बंगाल में हैं। इसके अलावा, 10 से कम छात्र संख्या वाले स्कूलों की तादाद भी बढ़कर 65,054 हो गई है।
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प्राइवेट स्कूलों की तरफ बढ़ता रुझान: ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में भी अभिभावक अब अपने बच्चों को सरकारी के बजाय निजी स्कूलों में भेजना पसंद कर रहे हैं, जिससे सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या लगातार घट रही है।
सबसे बड़ी चिंता: 10 साल में 2.26 करोड़ एडमिशन घटे, बढ़ा ड्रॉपआउट
नीति आयोग की रिपोर्ट में जो सबसे चिंताजनक पहलू सामने आया है, वह है स्कूलों में बच्चों के कुल नामांकन (Admission) में आई भारी गिरावट।
वर्ष 2014-15 में जहां देश के स्कूलों में 26.95 करोड़ बच्चे नामांकित थे, वहीं अब यह आंकड़ा घटकर 24.69 करोड़ रह गया है। यानी एक दशक में 2.26 करोड़ बच्चों ने स्कूल छोड़ दिया या दाखिला ही नहीं लिया।
इसका सबसे ज्यादा बुरा असर सेकेंडरी स्तर (कक्षा 9वीं और 10वीं) पर देखा गया है, जहाँ ड्रॉपआउट रेट (पढ़ाई बीच में छोड़ना) सबसे अधिक है।
एक्सपर्ट्स का क्या कहना है?
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में प्राथमिक स्कूलों के बंद होने या दूर के स्कूलों में विलय होने से गरीब परिवारों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। दूर के स्कूलों में बच्चों को भेजना बेहद खर्चीला और असुरक्षित हो गया है, जिसका सबसे बड़ा नुकसान लड़कियों की शिक्षा को हुआ है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी।
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