The khatiya khadi news [सूरजपुर]
जहाँ पूरी दुनिया बच्चों को ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ और ‘कोडिंग’ सिखा रही है, वहीं सूरजपुर के देवीपुर स्थित अंबेडकर पारा माध्यमिक शाला ने शिक्षा के क्षेत्र में एक बिल्कुल ‘हटके’ और ‘गंदा’ प्रयोग कर डाला। स्कूल प्रबंधन ने बच्चों को किताबों से दूर ले जाकर सीधे ‘बर्तन-विज्ञान’ की व्यावहारिक शिक्षा देने की ठानी, और इसके लिए लैब चुनी गई— स्कूल के पास बहता हुआ गंदा नाला!

प्रैक्टिकल क्लास: नाला बना सिंक, बच्चे बने ‘डिशवॉशर’

जी हाँ, सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो ने इस ‘स्मार्ट क्लास’ की पोल खोल दी है। वीडियो में दिख रहा है कि मिड-डे-मील के बड़े-बड़े पतीले और बर्तन साफ करने के लिए बच्चों को किसी नल या हैंडपंप पर नहीं, बल्कि नाले के काले पानी में उतारा गया है।
शायद हेडमास्टर साहिबा का मानना था कि नाले के पानी में मौजूद खनिज तत्व और बैक्टीरिया बच्चों की ‘इम्यूनिटी’ इतनी बढ़ा देंगे कि भविष्य में उन्हें किसी वैक्सीन की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। बच्चे भी पूरी निष्ठा के साथ कीचड़ में खड़े होकर बर्तन चमका रहे थे, मानो वे “स्वच्छ भारत अभियान” को एक नई (और उल्टी) दिशा दे रहे हों।
विभाग ने थमाया ‘सस्पेंशन का सर्टिफिकेट’
जब यह वीडियो शिक्षा विभाग के गलियारों तक पहुँचा, तो डीईओ (जिला शिक्षा अधिकारी) साहब को यह ‘क्रिएटिविटी’ बिल्कुल रास नहीं आई। उन्होंने तुरंत जांच के आदेश दिए और ‘बर्तन-विज्ञान’ की इस क्लास की मुख्य सूत्रधार हेडमास्टर मारिया गोरेती को निलंबन का सर्टिफिकेट थमा दिया।
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सज़ा का मेन्यू: हेडमास्टर सस्पेंड, सहायक शिक्षिकाओं की वेतनवृद्धि (इंक्रीमेंट) पर नाले का पानी फिर गया, और संकुल प्राचार्य को ‘कारण बताओ’ की कड़वी गोली दी गई है।
हड़ताल का तड़का और बच्चों का रायता
कहा जा रहा है कि रसोइया संघ की हड़ताल की वजह से गुरुजी खुद बर्तन मांजने के मूड में नहीं थे। ऐसे में उन्होंने ‘बाल श्रम’ का ऐसा तड़का लगाया कि पूरी स्कूल व्यवस्था का रायता फैल गया। कलेक्टर साहब ने भी सख्त लहजे में साफ़ कर दिया है कि स्कूल को ‘धोबी घाट’ बनाने वालों की खैर नहीं है।
निष्कर्ष: कहते हैं ‘कीचड़ में ही कमल खिलता है’, लेकिन यहाँ तो गुरुजी ने बच्चों को ही कीचड़ में उतार दिया ताकि स्कूल के बर्तन खिल सकें। अब बर्तन तो चमक गए, लेकिन हेडसाहब के करियर पर ऐसा दाग लगा है जिसे नाले का क्या, गंगा का पानी भी नहीं धो पाएगा।
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