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ब्रिटिश साम्राज्य भी था कर्जदार! सीहोर के सेठ का ‘शाही’ हिसाब-किताब

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मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के रूठिया परिवार ने हाल ही में एक ऐसा दावा पेश किया है जिसने कानूनी और ऐतिहासिक गलियारों में हलचल मचा दी है। यह मामला साल 1915 का है, जब भारत पर अंग्रेजों का राज था। आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज।

क्या है पूरा मामला?

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जब ब्रिटिश सरकार को धन की कमी महसूस हुई, तब उन्होंने भारत के रईसों और सेठों से कर्ज लिया था। सीहोर के प्रसिद्ध व्यवसायी सेठ जुम्मालाल रूठिया ने उस समय ब्रिटिश हुकूमत को 35,000 रुपये का कर्ज दिया था।

▪️तारीख: 19 जनवरी 1915▪️दस्तावेज: ‘प्रोमिसरी नोट’ (वचन पत्र) के रूप में यह लेनदेन हुआ था।▪️ब्याज दर: उस समय इस राशि पर 4.5% वार्षिक ब्याज तय किया गया था।

अब कितनी हो गई यह रकम?

सेठ जुम्मालाल के पोते, सत्यनारायण रूठिया का दावा है कि उनके पास आज भी वह मूल दस्तावेज सुरक्षित है। 109 साल बीत जाने के बाद, चक्रवृद्धि ब्याज (Compound Interest) को जोड़कर यह राशि अब करोड़ों में पहुंच चुकी है। परिवार का कहना है कि यह केवल धन की बात नहीं, बल्कि उनके पूर्वजों की साख और ऐतिहासिक सच्चाई का मामला है। आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज।

कौन है रूठिया परिवार?

सीहोर का रूठिया परिवार एक जमाने में रियासत का सबसे बड़ा व्यापारिक घराना माना जाता था।

  • रसूख: कहा जाता है कि इस परिवार की गिनती उन चुनिंदा लोगों में होती थी, जिनसे खुद अंग्रेज अफसर सलाह लेते थे।

  • विरासत: इनके पास आज भी ब्रिटिश काल के कई दुर्लभ सिक्के, पत्र और कानूनी दस्तावेज मौजूद हैं।

  • वर्तमान स्थिति: परिवार अब कानूनी विशेषज्ञों से सलाह ले रहा है ताकि भारत सरकार या ब्रिटिश दूतावास के माध्यम से इस ‘शाही कर्ज’ की वसूली की प्रक्रिया शुरू की जा सके।

क्या वाकई मिलेगी रकम?

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ‘प्रोमिसरी नोट’ एक वैध दस्तावेज है, लेकिन 100 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद ‘लिमिटेशन एक्ट’ (परिसीमा अधिनियम) जैसी बाधाएं सामने आ सकती हैं। हालांकि, अगर परिवार इसे ऐतिहासिक धरोहर और ब्रिटिश सरकार की देनदारी के रूप में पेश करता है, तो यह एक अंतरराष्ट्रीय कानूनी मुद्दा बन सकता है।

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