नई दिल्ली 24/10/2026: लोकतंत्र में विरोध दर्ज कराने के अधिकार और सार्वजनिक शांति बनाए रखने की जवाबदेही के बीच संतुलन हमेशा से बहस का विषय रहा है. हाल ही में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नेताओं द्वारा ‘पीस बॉन्ड’ भरे जाने और इसके खिलाफ नेहा बोरा द्वारा दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने के बाद पीस बॉन्ड का कानूनी पहलू एक बार फिर सुर्खियों में है.

आमतौर पर ‘पीस बॉन्ड’ नाम से ऐसा लगता है कि यह शांति बनाए रखने के लिए किसी समझौते या वादे की तरह है, लेकिन कानूनी रूप से यह एक निवारक (प्रिवेंटिव) व्यवस्था है.
1. क्या होता है ‘पीस बॉन्ड’?
पीस बॉन्ड भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के अध्याय 9 के तहत आता है.
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निवारक कदम (Preventive Action): यह किसी अपराध के लिए दी जाने वाली सजा नहीं है, बल्कि संभावित अपराध या अशांति को रोकने के लिए उठाया गया एक प्रशासनिक कदम है.
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लिखित उपक्रम (Written Undertaking): जब स्थानीय प्रशासन या पुलिस को अंदेशा होता है कि किसी व्यक्ति या एक्टिविस्ट की गतिविधियों से सार्वजनिक शांति भंग हो सकती है, तो उस व्यक्ति से एक निश्चित समय अवधि के लिए शांति बनाए रखने का लिखित हलफनामा या वादा लिया जाता है.
2. हस्ताक्षर करने से इनकार करने पर कानूनी परिणाम
यदि कोई व्यक्ति या राजनीतिक कार्यकर्ता पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने से मना करता है, तो कानून में इसके लिए कड़े प्रावधान हैं:
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बीएनएसएस धारा 136 (3): यदि कोई व्यक्ति पीस बॉन्ड भरने या मांगी गई ज़मानत (surety) पेश करने में असमर्थ रहता है या इनकार करता है, तो उसे हिरासत में लिया जा सकता है.
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न्यायिक हिरासत: संबंधित मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को तब तक न्यायिक हिरासत में भेज सकता है जब तक कि वह बॉन्ड पर हस्ताक्षर न कर दे या मामले की जांच पूरी न हो जाए. जांच पूरी करने की अधिकतम समय-सीमा छह महीने निर्धारित की गई है.
3. पीस बॉन्ड का उल्लंघन और गिरफ्तारी की सीमा
यदि कोई व्यक्ति पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने के बाद उसकी शर्तों को तोड़ता है, तो निम्नलिखित परिणाम हो सकते हैं:
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बीएनएसएस धारा 141 (1) (b): मजिस्ट्रेट द्वारा शर्तों के उल्लंघन से संतुष्ट होने पर व्यक्ति को तुरंत गिरफ्तार कर जेल भेजने का आदेश दिया जा सकता है.
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जेल की अवधि: उल्लंघन साबित होने पर व्यक्ति को उस बॉन्ड की बची हुई अवधि के लिए जेल में रखा जा सकता है. बीएनएसएस के तहत पीस बॉन्ड की अधिकतम अवधि एक वर्ष हो सकती है.
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धारा 170 के तहत प्रिवेंटिव हिरासत: यदि पुलिस को लगता है कि वह व्यक्ति फिर से कोई संज्ञेय (cognizable) अपराध करने जा रहा है, तो उसे धारा 170 के तहत पुनः प्रिवेंटिव हिरासत में लिया जा सकता है.
4. नेहा बोरा की याचिका और शक्तियों के दुरुपयोग पर उठते सवाल
राजनीतिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि पीस बॉन्ड का इस्तेमाल अक्सर लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक असहमति को दबाने के लिए किया जाता है. इसी पृष्ठभूमि में नेहा बोरा ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर पीस बॉन्ड की वैधता और इसके मनमाने इस्तेमाल को चुनौती दी है.
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व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम प्रशासनिक शक्तियां: अदालतों और भारतीय विधि आयोग ने समय-समय पर इन निवारक शक्तियों के दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त की है.
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विधि आयोग की 41वीं रिपोर्ट (1969): 1969 में विधि आयोग ने सिफारिश की थी कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाली ये शक्तियां पूरी तरह से न्यायिक मजिस्ट्रेटों के पास ही होनी चाहिए, ताकि कार्यपालिका या पुलिस इनका मनमाना इस्तेमाल न कर सके.
क्या आप नेहा बोरा की याचिका में उठाए गए कानूनी तर्कों या बीएनएसएस (BNSS) के अन्य प्रिवेंटिव प्रावधानों के बारे में अधिक विवरण चाहते हैं?




