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परंपरा का नया अध्याय: राजस्थान में पहली बार 12 साल की ‘तेजस्वी’ बनीं गांव की ठाकुर, 65 साल बाद हुआ ‘रक्त तिलक’

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पाली (राजस्थान) 28 जून । राजस्थान के पाली जिले से एक ऐसी ऐतिहासिक तस्वीर सामने आई है, जिसने रूढ़िवादिता को तोड़कर सदियों पुरानी परंपराओं के बीच एक नया और गौरवशाली अध्याय जोड़ दिया है। जिस समाज को अक्सर घूंघट और कड़े पारंपरिक रीति-रिवाजों के लिए जाना जाता है, उसी समाज में पहली बार एक 12 वर्षीय बालिका को पूरे गांव का ठाकुर और उत्तराधिकारी घोषित किया गया है।

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यह ऐतिहासिक रस्म पाली जिले के प्रसिद्ध खैरवा ठिकाने में निभाई गई। दरअसल, खैरवा गढ़ के ठाकुर हरीशचंद्र जोधा के निधन के बाद, उनकी सुपुत्री तेजस्वी कुमारी जोधा को उनका वैधानिक उत्तराधिकारी बनाया गया है।

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जोधपुर राजपरिवार से आई पाग, वैदिक मंत्रोच्चार से हुआ अभिषेक

खैरवा गढ़ में आयोजित इस भव्य और ऐतिहासिक समारोह में 25 से अधिक गांवों के राजपरिवारों और ठाकुर परिवारों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। सभी की सर्वसम्मति और गरिमामयी उपस्थिति में पूर्व राजवंशों की गौरवशाली परंपरा के अनुसार तेजस्वी कुमारी जोधा का राजतिलक किया गया।

शाही सम्मान: समारोह के दौरान विशेष रूप से जोधपुर के पूर्व राजपरिवार की ओर से भेजी गई पारंपरिक ‘पाग’ (पगड़ी) तेजस्वी कुमारी के सिर पर बांधी गई। यह रस्म जोधपुर राजपरिवार के प्रतिनिधि ने पूरी की, जिसके बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच उनका भव्य पूजन और अभिषेक किया गया।

65 साल बाद तलवार की धार और ‘रक्त तिलक’ की रस्म

इस राजतिलक समारोह का सबसे मुख्य और ऐतिहासिक आकर्षण ‘रक्त तिलक’ की रस्म रही। राजपुरोहित शंकर सिंह ने सदियों पुरानी राजपूती परंपरा को जीवंत करते हुए तलवार से अपने अंगूठे पर हल्का सा चीरा लगाया और उसी रक्त से तेजस्वी कुमारी जोधा के मस्तक पर तिलक किया।

माना जा रहा है कि पूर्व राजवंशों की यह पारंपरिक और अत्यंत दुर्लभ रस्म करीब 65 साल बाद दोबारा निभाई गई है। इसके साथ ही तेजस्वी कुमारी को आधिकारिक तौर पर खैरवा गढ़ का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया।

25 से अधिक गांवों की सहमति से बना इतिहास

तेजस्वी कुमारी को उत्तराधिकारी और ठाकुर बनाने का यह फैसला केवल एक परिवार तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक बड़ा सामाजिक बदलाव और एकजुटता थी। आस-पास के 25 से अधिक गांवों के राजपरिवारों और प्रबुद्ध ठाकुर परिवारों ने इस फैसले पर अपनी सामूहिक सहमति जताई।

पारंपरिक वैभव का नजारा:

इस ऐतिहासिक पल का गवाह बनने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण और दूर-दराज से आए अतिथि मौजूद रहे। पूरा खैरवा गढ़ पारंपरिक राजपूती वैभव में डूबा नजर आया। समारोह के दौरान नई ठाकुर (तेजस्वी कुमारी) पर चंवर डुलाए गए और चांदी के दंड (छड़ी) लिए दरबारी परंपरागत वेशभूषा में मुस्तैद दिखे, जो राजस्थान के स्वर्णिम इतिहास की याद दिला रहा था।

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