“दुनिया की नजरें इस वक्त मध्य पूर्व के धधकते रणक्षेत्र पर टिकी हैं, जहाँ अमेरिका और इसराइल की संयुक्त सैन्य कार्रवाई ने ईरान की सत्ता को हिला कर रख दिया है। लेकिन इस बारूद की गंध के बीच सुदूर पूर्व में एक रहस्यमयी शांति पसरी है। रणनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वाशिंगटन की व्यस्तता का फायदा उठाकर बीजिंग ताइवान पर बड़ा दांव खेलेगा? या फिर मार्च के अंत में होने वाली राष्ट्रपति ट्रंप की चीन यात्रा से पहले यह ‘ड्रैगन’ की कोई सोची-समझी कूटनीतिक खामोशी है? आइए जानते हैं इस भू-राजनीतिक शतरंज की बिसात का पूरा सच।”
1. रणक्षेत्र मध्य पूर्व, नजरें ताइवान पर
दुनिया का ध्यान इस समय अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच छिड़े युद्ध पर है। रणनीतिक हलकों में यह सवाल उठना लाजिमी था कि क्या अमेरिका के दो मोर्चों (Middle East और Pacific) पर बंटने का फायदा उठाकर चीन ताइवान पर सैन्य कार्रवाई करेगा?
1950 के दशक के विपरीत, इस बार चीन की सैन्य गतिविधियां ताइवान जलडमरूमध्य (Taiwan Strait) में आश्चर्यजनक रूप से कम हो गई हैं। यह “रणनीतिक चुप्पी” विश्लेषकों को चौंका रही है।
2. ट्रम्प की चीन यात्रा: ‘डील’ की तैयारी?
मार्च के अंत में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की प्रस्तावित बीजिंग यात्रा इस शांति का सबसे बड़ा कारण मानी जा रही है।
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कूटनीतिक संकेत: चीन अपनी सैन्य गतिविधियों को कम करके यह संदेश देना चाहता है कि वह तनाव बढ़ाने के पक्ष में नहीं है।
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बार्गेनिंग चिप: ताइवान मुद्दे पर चीन किसी भी आक्रामक कदम के बजाय मेज पर बैठकर ट्रम्प प्रशासन से कुछ बड़ी रियायतें (जैसे टैरिफ में कमी या चिप तकनीक तक पहुंच) हासिल करना चाहता है।
3. ऊर्जा संकट: चीन की कमजोर नस
ईरान और वेनेजुएला जैसे तेल समृद्ध देशों पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई ने चीन की एनर्जी सप्लाई चेन को हिला कर रख दिया है।
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चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है।
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ईरान और वेनेजुएला पर प्रतिबंधों और युद्ध की स्थिति ने चीन के लिए ऊर्जा की कीमतों को आसमान पर पहुँचा दिया है।
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रणनीतिक मजबूरी: ऐसे समय में ताइवान पर हमला करना चीन की अपनी अर्थव्यवस्था के लिए आत्मघाती हो सकता है, क्योंकि युद्ध की स्थिति में समुद्री व्यापार मार्ग (Sea Lanes) पूरी तरह बाधित हो जाएंगे।
4. 1950 बनाम 2026: क्या बदला?
यद्यपि चीन ने अतीत में अमेरिका की व्यस्तता का फायदा उठाया था, लेकिन आज का चीन वैश्विक अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ा है।
“आज युद्ध केवल जमीन पर नहीं, बल्कि सेमीकंडक्टर चिप्स, ग्लोबल बैंकिंग (SWIFT) और ऊर्जा सुरक्षा के धरातल पर लड़ा जा रहा है।”
निष्कर्ष
चीन इस समय “इंतजार करो और देखो” (Wait and Watch) की नीति अपना रहा है। वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहा है और ट्रम्प के साथ होने वाली वार्ता को एक बड़े अवसर के रूप में देख रहा है। ताइवान पर फिलहाल शांत रहकर वह खुद को एक ‘जिम्मेदार वैश्विक शक्ति’ के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है।
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