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गेवरा खदान में ‘कोयला युद्ध’: सुरक्षा घेरे को ठेंगा दिखाकर रसूखदारों के गुर्गों ने की खूनी मारपीट, वीडियो वायरल

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कोरबा (गेवरा/दीपका) : एशिया की सबसे बड़ी कोयला खदानों में शुमार साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) की गेवरा परियोजना इन दिनों कोयला उत्पादन के लिए कम और ‘वर्चस्व की जंग’ के लिए ज्यादा चर्चा में है। बीती रात इस परियोजना के भीतर जो कुछ हुआ, उसने न केवल औद्योगिक सुरक्षा के दावों की पोल खोल दी है, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यहाँ कानून का राज नहीं, बल्कि रसूखदारों की लाठी चलती है। कोयला लिफ्टिंग को लेकर दो निजी कंपनियों के बीच हुआ विवाद अब एक बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक सवाल में तब्दील हो चुका है।

सुरक्षा घेरे में ‘सर्जिकल स्ट्राइक’

हैरानी की बात यह नहीं है कि दो कंपनियों के बीच विवाद हुआ; हैरानी की बात यह है कि यह पूरी वारदात वहां तैनात सुरक्षा बलों की आंखों के सामने हुई। घटना के वायरल वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि कैसे हमलावर बेखौफ होकर लाठी-डंडों से लैस हैं और दूसरे पक्ष को बेरहमी से पीट रहे हैं। खदान के भीतर, जहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता और जहां प्रवेश के लिए कड़े प्रोटोकॉल होते हैं, वहां बाउंसरों की फौज कैसे घुसी और कैसे घंटों तक तांडव मचाती रही? यह सवाल SECL की सुरक्षा व्यवस्था और स्थानीय पुलिस की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा करता है।

वर्चस्व का पुराना खिलाड़ी और नए मोहरे

सूत्रों की मानें तो गेवरा खदान के भीतर कोयला लिफ्टिंग के कारोबार पर लंबे समय से के.के. एंटरप्राइजेज का एकछत्र राज रहा है। आरोप है कि जब भी कोई दूसरी कंपनी—जैसे कि इस मामले में केसीपीएल (KCPL)—नियमों के तहत अपना काम करने की कोशिश करती है, तो उसे बाहुबल के दम पर रोकने का प्रयास किया जाता है। बीती रात भी यही हुआ। केसीपीएल के कर्मचारी जब अपने काम पर तैनात थे, तभी के.के. एंटरप्राइजेज से जुड़े दर्जनों कथित गुर्गों और बाउंसरों ने उन पर धावा बोल दिया। मामूली कहासुनी से शुरू हुआ मामला देखते ही देखते खूनी संघर्ष में बदल गया। हमले में केसीपीएल के कई कर्मचारी गंभीर रूप से घायल हुए हैं, जिन्हें नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

सत्ता का संरक्षण और ‘खाकी’ की बेबसी

क्षेत्र में यह चर्चा आम है कि इन कोल लिफ्टरों को सत्ता के गलियारों में बैठे कुछ रसूखदारों और विभाग के ही कुछ भ्रष्ट अधिकारियों का ‘वरदहस्त’ प्राप्त है। इसी संरक्षण का परिणाम है कि इन हमलावरों के मन में कानून का कोई डर नहीं बचा है। खदान के भीतर कार्यरत अन्य श्रमिक और SECL के अधिकारी भी इस गुंडागर्दी से सहमे हुए हैं। नाम न छापने की शर्त पर एक अधिकारी ने बताया कि “यहाँ माहौल काम करने लायक नहीं रह गया है, कब कौन हमला कर दे, कुछ कहा नहीं जा सकता।”

आर्थिक और औद्योगिक साख पर चोट

गेवरा परियोजना देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाली सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। इस तरह की हिंसक वारदातों से न केवल कोयला प्रेषण (Dispatch) प्रभावित होता है,  यदि निजी कंपनियों के आपसी विवाद इसी तरह सड़कों और खदानों के भीतर लड़ते रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब यहाँ का सामान्य कामकाज पूरी तरह ठप हो जाएगा।

पुलिस की भूमिका: न्याय या खानापूर्ति?

दीपका पुलिस ने प्राथमिकी (FIR) तो दर्ज कर ली है, लेकिन पुलिस की अब तक की शिथिलता कई संदेह पैदा करती है। क्या पुलिस केवल उन मजदूरों या बाउंसरों को पकड़ेगी जिन्होंने लाठियां चलाईं, या फिर जांच की आंच उन ‘सफेदपोश आकाओं’ तक भी पहुंचेगी जिन्होंने इन अपराधियों को खदान के भीतर तांडव मचाने की छूट दे रखी है? जनता की नजरें अब प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं।

गेवरा खदान में हुई यह हिंसा केवल दो निजी कंपनियों का झगड़ा नहीं है, बल्कि यह व्यवस्था की सड़ांध का प्रमाण है। अगर समय रहते इन ‘कोयला माफियाओं’ के सिंडिकेट को नहीं तोड़ा गया, तो आने वाले समय में यहाँ वर्चस्व की यह जंग और भी भयावह रूप ले सकती है।

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