Gold & Silver : सोने और चांदी की कीमतों में आई अभूतपूर्व तेज़ी थमने का नाम नहीं ले रही है। सोने ने अपने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ते हुए नया ऑल टाइम हाई बनाया है। वहीं, चांदी की कीमत पहली बार 2 लाख रुपये प्रति किलोग्राम के ऐतिहासिक आंकड़े को पार कर गई है, हालांकि वर्तमान में इसमें मामूली गिरावट दर्ज हुई है।
इस ‘ब्रेक फेल’ तेज़ी ने जहाँ खरीदारों की चिंता बढ़ा दी है, वहीं वित्तीय विशेषज्ञ इसे एक बड़ी खतरे की घंटी मान रहे हैं।
ताज़ा सोने-चांदी के भाव
इंडिया बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन की वेबसाइट पर जारी रेट लिस्ट के अनुसार, 15 दिसंबर को सोने की कीमत में 3300 रुपये से अधिक की तेज़ी दर्ज की गई है:
| विवरण | कीमत (प्रति 10 ग्राम) |
| 24 कैरेट सोना | ₹1,33,440 के पार |
| 22 कैरेट सोना | ₹1,22,230 |
| 18 कैरेट सोना | ₹1,00,080 |
वहीं, चांदी की कीमत मामूली गिरावट के बावजूद ₹1,92,222 प्रति किलोग्राम पर बनी हुई है।
महंगा सोना: मुनाफा नहीं, बल्कि डर और अनिश्चितता का संकेत
चार्टर्ड फाइनेंशियल एनालिस्ट हिमांशु पंड्या ने सोने की लगातार बढ़ती कीमत पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनके अनुसार, इस तेज़ी को केवल मुनाफे से जोड़ना सही नहीं है, बल्कि यह बाजार में डर और अनिश्चितता का स्पष्ट संकेत है।
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कौन खरीद रहा है? वर्तमान में सबसे अधिक खरीदारी केंद्रीय बैंक, सॉवरेन फंड और संस्थागत निवेशक कर रहे हैं।
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खरीदारी का कारण: यह खरीदारी मुनाफे के लिए नहीं, बल्कि किसी बड़े संकट की आशंका में एक सुरक्षा कवच बनाने की रणनीति है। केंद्रीय बैंक देश की अर्थव्यवस्था को मुश्किल दौर में बचाने के लिए, जबकि संस्थागत निवेशक अपने पोर्टफोलियो को संभालने के लिए सोना खरीद रहे हैं।
सोने की कीमत बढ़ना क्यों है ‘वैश्विक खतरा’?
सोने की बढ़ती कीमत यह दर्शाती है कि लोगों का भरोसा अब पारंपरिक निवेश साधनों (जैसे सरकारी बॉन्ड) और करेंसी पर से घट रहा है।
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विश्वास का टूटना: लोग अब अनिश्चितता के दौर में डॉलर या सरकारी बॉन्ड की जगह सोने को सुरक्षित निवेश मान रहे हैं।
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सरकार समर्थित संपत्ति से दूरी: सोने पर बढ़ती निर्भरता लोगों को उन संपत्तियों से दूर कर रही है, जिन पर सरकार का नियंत्रण होता है।
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केन्द्रीय बैंकों की अंधाधुंध खरीदारी: चीन और भारत जैसे देश, जो पहले सोना बेचते थे, अब अपना गोल्ड रिजर्व बढ़ा रहे हैं। यह डॉलर पर निर्भरता कम करने की रणनीति है और वैश्विक खतरे का स्पष्ट संकेत है। पिछले एक साल में सोने की कीमत में 63% की तेज़ी आई है।
1970 का दशक क्यों याद आ रहा है?
हिमांशु पंड्या ने सोने की मौजूदा तेज़ी को 1970 के दशक में तेल की कीमतों में आई अप्रत्याशित वृद्धि से जोड़ा है:
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1973 का तेल संकट: 1973 में अरब-इजरायल युद्ध के दौरान, अमेरिका द्वारा इजरायल का समर्थन करने पर OPEC के अरब देशों ने अमेरिका और उसके समर्थकों को तेल बेचना बंद कर दिया था।
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कीमतों में उछाल: इस संकट के चलते तेल की कीमतें 4 गुना बढ़कर $3 से $12 पर पहुँच गईं।
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परिणाम: इस ‘तेल के खेल’ ने अमेरिका समेत दुनियाभर के देशों को महंगाई और बेरोजगारी के गहरे संकट में फंसा दिया था।
पंड्या का मानना है कि जो उस दौर में तेल के साथ हुआ, वैसा ही कुछ आज सोने के साथ देखने को मिल रहा है, जो ग्लोबल इकोनॉमी के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।








