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मरीजों का इलाज करने वाले मसीहा खुद बर्नआउट के शिकार, मानसिक तनाव के मामलों में 41% का उछाल

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नई दिल्ली 3 जुलाई : डॉक्टरों को अक्सर संकट के समय शांत रहने वाले और दूसरों को जीवनदान देने वाले ‘मसीहा’ के रूप में देखा जाता है। वे दिन-रात गंभीर मरीजों का इलाज करते हैं, चिंतित परिवारों को ढाढस बंधाते हैं (आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज) और भारी दबाव में फैसले लेते हैं। लेकिन आज के समय में इस सिक्के का दूसरा पहलू बेहद चिंताजनक है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अब डॉक्टर खुद परामर्श की मेज के दूसरी तरफ (मरीज के रूप में) बैठने को मजबूर हैं।

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चौंकाने वाले आंकड़े: डॉक्टरों में बढ़ा मानसिक तनाव

इस डॉक्टर दिवस पर, मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों ने भारत की स्वास्थ्य प्रणाली में एक गंभीर संकट की ओर इशारा किया है।(आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज) कैडाबम्स अस्पतालों (Cadabams Hospitals) के विशेषज्ञों द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों से मदद मांगने वाले डॉक्टरों की संख्या में 41% की भारी वृद्धि दर्ज की गई है।

डॉक्टरों में मुख्य रूप से ये लक्षण देखे जा रहे हैं:

  • क्रॉनिक स्ट्रेस (पुरानी तनाव की स्थिति) और भावनात्मक थकावट।

  • बर्नआउट और एंग्जायटी (चिंता)।

  • नींद न आना और भावनात्मक रूप से सुन्न (Emotional Numbness) हो जाना।

  • काम और निजी जिंदगी के बीच संतुलन (Work-Life Balance) न बना पाना।

बदल रही है रूढ़िवादी सोच

पारंपरिक रूप से, चिकित्सा जगत की संस्कृति ऐसी रही है जहां डॉक्टरों से उम्मीद की जाती है कि वे अपने दर्द को भूलकर मरीजों को प्राथमिकता दें। इस वजह से डॉक्टर मानसिक रूढ़ियों (Stigma) के चलते मदद मांगने से कतराते थे। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अब इस मानसिकता में सकारात्मक बदलाव आ रहा है। (आप पढ़ रहे हैं द खटिया खड़ी न्यूज) डॉक्टर अब अपनी मानसिक स्थिति को लेकर खुलकर बात कर रहे हैं।

शोध के डराने वाले आंकड़े: हालिया भारतीय शोध से पता चलता है कि भारत में लगभग चार में से एक स्वास्थ्य पेशेवर (25%) कार्य से संबंधित ‘बर्नआउट’ का सामना कर रहा है।

देरी से मदद मांगना बन रहा है चुनौती

रिपोर्ट के अनुसार, कई डॉक्टर अपनी मांगलिक क्लिनिकल जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी भारी मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं। अक्सर वे मदद मांगने में तब तक देरी करते हैं, जब तक कि यह तनाव उनके व्यक्तिगत संबंधों, जीवन की गुणवत्ता या समग्र मानसिक भलाई को प्रभावित न करने लगे। विशेषज्ञों का कहना है कि ‘डॉक्टरों की देखभाल कौन करेगा?’ इस सवाल पर अब पूरी स्वास्थ्य प्रणाली को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

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