कोरबा-कटघोरा। इसे कहते हैं ‘स्मार्ट वर्क’! कटघोरा वनमंडल के केंदई परिक्षेत्र में जादुई इंजीनियरिंग का ऐसा नमूना पेश किया गया है कि बड़े-बड़े आर्किटेक्ट भी सिर खुजलाने लगें। यहाँ लेमरू हाथी रिजर्व के नाम पर सरकारी खजाने में ऐसी ‘सेंध’ लगाई गई है कि हाथी तो क्या, मेंढक भी पानी को तरस जाए।


नाला बना तालाब, 16 लाख का हिसाब ‘साफ’
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार सुनने में आया है कि विभाग ने 16 लाख रुपये की भारी-भरकम राशि से एक भव्य तालाब का ‘निर्माण’ किया है। पर हकीकत ये है कि ग्राम पतुरियाडाँड़ के जंगल में एक बेचारा पुराना नाला चुपचाप बह रहा था, अफसरों की नजर उस पर क्या पड़ी, रातों-रात उसे ‘तालाब’ घोषित कर दिया गया। ग्रामीणों की मानें तो इस ‘नवनिर्माण’ पर 2 लाख भी खर्च नहीं हुए, लेकिन कागजों पर भ्रष्टाचार की ऐसी मखमली घास उगाई गई है कि पूरे 16 लाख डकार लिए गए।

मशीनों का ‘मानवीकरण’ और पत्थरों की चोरी
सरकार कहती है मजदूरों को काम दो, लेकिन साहब को ‘स्पीड’ पसंद है। इसलिए चुपके से जेसीबी और ट्रैक्टर उतारे गए और एक हफ्ते में ‘खेला’ खत्म! मजेदार बात ये है कि पत्थर भी जंगल के ही उठाकर लगा दिए गए (शायद इसे ही लोकल फॉर वोकल कहते हैं)। अब रिकॉर्ड में तो दर्ज है कि मजदूरों ने पसीना बहाया है, पर असल में पसीना तो सिर्फ उन फाइलों का निकल रहा है जिन्हें दबाने की कोशिश जारी है।

सूखा तालाब: हाथियों के लिए ‘डिजिटल’ पानी!
परियोजना का उद्देश्य था हाथियों की प्यास बुझाना, लेकिन वर्तमान में यह तालाब रेगिस्तान को मात दे रहा है। पानी की एक बूंद नहीं रुक रही, पर भ्रष्टाचार की धार इतनी तेज है कि रुकने का नाम नहीं ले रही। जंगल के साहब और उनकी टीम ने शायद सोच लिया है कि हाथी अब ‘डिजिटल इंडिया’ के दौर में बिना पानी के ही प्यास बुझाना सीख जाएंगे।
जांच की रस्म अदायगी
कोरबा और कटघोरा वनमंडल के इतिहास को देखते हुए उम्मीद है कि इस मामले में भी एक ‘कठोर’ जांच होगी। जांच अधिकारी आएंगे, चाय-नाश्ता करेंगे और अंत में रिपोर्ट देंगे कि “सब चंगा सी!” वैसे भी यहाँ दोषी साबित होने के बाद भी ‘क्लीन चिट’ मिलना उतना ही आसान है जितना 16 लाख के बजट में 2 लाख का काम करना।
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