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अदालती समय की बर्बादी पर हाईकोर्ट सख्त: रिव्यू पिटीशन खारिज, याचिकाकर्ता पर 50 हजार का जुर्माना

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बिलासपुर,छत्तीसगढ़ 22 दिसंबर।छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने और बार-बार याचिकाएं दायर कर अदालत का समय बर्बाद करने वाले एक सरकारी कर्मचारी पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने विभागीय जांच में सजा पाए कर्मचारी की रिव्यू पिटीशन (पुनर्विचार याचिका) को न केवल खारिज कर दिया, बल्कि याचिकाकर्ता पर 50 हजार रुपए का अर्थदंड भी लगाया है।

“पुनर्विचार याचिका दोबारा सुनवाई का जरिया नहीं”

मामले की सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि रिव्यू पिटीशन का उद्देश्य फैसले में हुई किसी स्पष्ट कानूनी भूल को सुधारना होता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब मूल फैसले में कोई त्रुटि न हो, तो सिर्फ मामले की दोबारा सुनवाई (Re-hearing) कराने के इरादे से याचिका दायर करना न्यायिक प्रक्रिया का खुला दुरुपयोग है।

वकीलों को बदलने की प्रवृत्ति पर उठाए सवाल

अदालत ने याचिकाकर्ता द्वारा अपनाई गई रणनीति पर भी सवाल खड़े किए। कोर्ट ने कहा कि अलग-अलग चरणों में नए-नए वकीलों को नियुक्त कर बार-बार एक ही मामले को कोर्ट के सामने लाना ‘बार’ की स्वस्थ परंपरा के खिलाफ है। बेंच ने इसे कानूनी प्रक्रिया को उलझाने की कोशिश करार दिया।

क्या है पूरा मामला?

यह प्रकरण याचिकाकर्ता संजीव कुमार यादव से जुड़ा है। संजीव के खिलाफ विभाग द्वारा विभागीय जांच (Departmental Inquiry) बैठाई गई थी, जिसमें उन्हें दोषी पाया गया था। दंड स्वरूप उनकी चार वेतनवृद्धियां (Increments) रोकने का आदेश जारी किया गया था।

संजीव कुमार यादव ने इस सजा को पहले हाईकोर्ट की सिंगल बेंच में चुनौती दी थी, लेकिन मामले के तथ्यों और मेरिट को देखते हुए जनवरी 2025 में सिंगल बेंच ने याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद, राहत पाने के लिए उन्होंने डिवीजन बेंच में रिव्यू पिटीशन दायर की, जिसे अब अदालत ने भारी जुर्माने के साथ खारिज कर दिया है।

फैसले का मुख्य बिंदु

  • जुर्माना: 50,000 रुपए।

  • टिप्पणी: अदालती समय की बर्बादी और प्रक्रिया का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं।

  • संदेश: फैसले में स्पष्ट गलती होने पर ही रिव्यू पिटीशन का विकल्प चुने।

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