Latest News
बड़ी कार्रवाई: वेदांता बॉयलर ब्लास्ट मामले में चेयरमैन अनिल अग्रवाल समेत प्रबंधन पर FIR दर्ज वेदांता पावर प्लांट हादसा: उद्योग मंत्री ने किया घटनास्थल का निरीक्षण , तकनीकी पहलुओं की जाँच एवं एफआईआर दर्ज करने के दिए निर्देश कलेक्टर कुणाल दुदावत ने किया डिजिटल जनगणना प्रशिक्षण का निरीक्षण; प्रगणकों को दी त्रुटि रहित कार्य की हिदायत सनसनी: कोर्ट की दूसरी मंजिल से संदिग्ध परिस्थितियों में गिरा संदीप अग्रवाल, कटघोरा पुलिस पर लगाया जानलेवा हमले का आरोप भाजपा नेता केदारनाथ अग्रवाल बने गेवरा- दीपका,कुसमुंडा,कोरबा क्षेत्र के प्रभारी, एचएमएस ने किया भव्य स्वागत सरकारी क्वार्टर में संदिग्ध मौत: डॉक्टर पर  हत्या का संगीन आरोप
Home » देश » बिहार में क्यों नहीं चला प्रशांत किशोर का जादू? जाने महत्वपूर्ण कारण

बिहार में क्यों नहीं चला प्रशांत किशोर का जादू? जाने महत्वपूर्ण  कारण

Share:

 बिहार इलेक्शन 2025 : कभी देश के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक रणनीतिकारों में शुमार प्रशांत किशोर ने जन सुराज को एक वैकल्पिक राजनीति की शुरुआत बताया था, लेकिन मतदाता इससे जुड़ते नजर नहीं आए।

जन सुराज ने शुरुआत में 243 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की थी, हालांकि अंततः 240 सीटों पर मैदान में उतरी। प्रशांत किशोर तीन साल से अधिक समय से बिहार की धरती पर लगातार जनसंपर्क और पदयात्रा करते रहे। उनका दावा था कि जन सुराज स्थापित सत्ता समीकरणों को चुनौती देगा, लेकिन रुझानों ने इन दावों को ठंडा कर दिया है।

बिहार में क्यों नहीं चला प्रशांत किशोर का जादू?

1. ग्रामीण इलाकों में सीमित पहचान

बिहार की आबादी का बड़ा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है, लेकिन जन सुराज की पहुंच वहां पर्याप्त नहीं बन पाई। कई ग्रामीण मतदाताओं को पार्टी का चुनाव चिह्न तक नहीं पता था, जिससे वोट ट्रांसफर कमजोर रहा। 3,500 किलोमीटर से अधिक की पदयात्रा के बाद भी जन जागरूकता पारंपरिक दलों की तुलना में कम रही।

2. संगठन की कमजोर नींव और आंतरिक मतभेद

पार्टी ने मजबूत जमीनी संगठन खड़ा नहीं किया। कई कार्यकर्ताओं को टिकट न मिलने से नाराजगी रही और पैराशूट उम्मीदवारों को प्राथमिकता दिए जाने से मतभेद बढ़े। पूर्व आईपीएस आनंद मिश्रा सहित कई प्रमुख चेहरों का पार्टी छोड़ना इस आंतरिक असंतोष को और उजागर करता है।

3. जातीय समीकरणों की चुनौती

बिहार की राजनीति जातिगत संरचना से संचालित होती है। जन सुराज शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दों के सहारे ‘नई राजनीति’ की पेशकश लेकर आया, लेकिन जातीय गोलबंदी के सामने यह विचार कमजोर पड़ गया। खास तौर पर मुस्लिम वोटर और कई जातियां भाजपा को रोकने के लिए महागठबंधन को अधिक ‘सुरक्षित विकल्प’ मानकर उसके साथ रहीं।

4. उम्मीदवारों पर दबाव और नामांकन वापसी

प्रशांत किशोर ने भाजपा पर उनके उम्मीदवारों को धमकाने और प्रलोभन देने के आरोप लगाए। कई उम्मीदवारों द्वारा नामांकन वापस लेने से पार्टी का मोमेंटम टूट गया और यह संदेश गया कि बड़ी पार्टियों ने नए विकल्प को कमजोर कर दिया।

<>- मनीष कश्यप पर बड़ा अपडेट, चनपटिया सीट पर कौन आगे, चौंका देने वाला आंकड़ा आया सामने

5. प्रशांत किशोर का खुद चुनाव न लड़ना

पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा होने के बावजूद प्रशांत किशोर ने चुनाव नहीं लड़ा। इससे मतदाताओं में यह प्रश्न बना रहा कि क्या वे पूरी तरह राजनीति में उतरने को लेकर आश्वस्त हैं। पारंपरिक राजनीति में नेता का मैदान में उतरना विश्वसनीयता का प्रतीक माना जाता है, जो यहां अनुपस्थित था।

Leave a Comment