नकटी में ये कैसा ‘न्याय’ का मॉडल?
रायपुर (धरसींवा) 3 जुलाई : कहते हैं कानून की आंखें बंद होती हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ के रायपुर स्थित धरसींवा ब्लॉक के ग्राम नकटी में जो कुछ हुआ, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या कानून का बुलडोजर सिर्फ गरीबों की बेबसी देखकर ही चलता है? कुछ दिन पहले जिस कीमती सरकारी जमीन से सालों से रह रहे गरीब परिवारों को खदेड़कर उनके आशियाने मिट्टी में मिला दिए गए थे, आज उसी जमीन को वीवीआईपी (VVIPs)—विधायकों और सांसदों—को प्लॉट के रूप में बांटने की सुगबुगाहट तेज हो गई है।

प्रशासन ने तो फिलहाल इस पर चुप्पी साध रखी है, लेकिन इस चर्चा ने प्रदेश की सियासत में ऐसा उबाल ला दिया है जिसने सरकार की ‘गरीब हितैषी’ दावों की कलई खोलकर रख दी है।
उजड़ गई छत, बिखर गए सपने: क्या यही है इंसाफ?

पिछले दिनों जब नकटी में प्रशासन का पीला पंजा चला, तो चीख-पुकार और आंसुओं के बीच कई गरीब परिवारों के सिर से छत छिन गई। तब प्रशासन ने दलील दी थी कि “सरकारी जमीन पर अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं होगा।” बेघर हुए परिवारों ने खुले आसमान के नीचे रातें गुजारते हुए शायद यही सोचा होगा कि कानून सबके लिए बराबर है।
लेकिन, अब जब उसी ‘अतिक्रमण मुक्त’ कराई गई बेशकीमती जमीन पर रसूखदारों को भूखंड आवंटित करने की तैयारी की खबरें आ रही हैं, तो जनता पूछ रही है—यह कौन सा मॉडल है? क्या गरीबों के आशियाने उजाड़ना सिर्फ इसलिए जरूरी था ताकि बड़े लोगों के लिए आलीशान रास्तों का इंतजाम किया जा सके?

“जब हमारी झोपड़ियां टूटीं, तो कहा गया कि यह सरकारी जमीन है। अब जब बड़े साहबों को वही जमीन दी जा रही है, तो क्या वह सरकारी नहीं रही? क्या नियम सिर्फ हम गरीबों को रुलाने के लिए बनते हैं?” — एक पीड़ित ग्रामीण की बेबस आवाज
Advt
विपक्ष का तीखा हमला: “सिर्फ गरीबों की झोपड़ियों तक ही क्यों सीमित है बुलडोजर?”
इस संवेदनशील मुद्दे को लेकर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार की मंशा और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार इस मामले में पूरी तरह दोहरे मापदंड अपना रही है।
कांग्रेस नेताओं ने सीधे तौर पर प्रशासन को घेरते हुए पूछा है कि:
-
अगर सरकार सचमुच सरकारी जमीनों को लेकर इतनी गंभीर है, तो सालों से अवैध कब्जा जमाए बैठे बड़े उद्योगों और रसूखदार संस्थानों पर बुलडोजर क्यों नहीं चलता?
-
रसूखदारों के अवैध कब्जों के आगे नतमस्तक होने वाला प्रशासन सिर्फ गरीबों पर ही अपनी ताकत क्यों आजमाता है?
छवि पर दाग और पनपता जनआक्रोश
नकटी के स्थानीय लोगों में अपने घरों को खोने का दर्द और गुस्सा पहले से ही चरम पर है। ऐसे में रसूखदारों को उसी जमीन का मालिकाना हक सौंपने का यह नया विवाद आने वाले दिनों में सरकार के लिए एक बड़ा सियासी सिरदर्द बन सकता है। यदि यह प्रस्ताव सच साबित होता है, तो यह न केवल जनता के विश्वास पर गहरी चोट होगी, बल्कि लोकतंत्र के उस वादे पर भी तमाचा होगा जो अमीर और गरीब को एक ही तराजू में तौलने की बात करता है।









