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दावे शत-प्रतिशत के, सुविधाएं शून्य! कोरबा के 600 से ज्यादा स्कूलों में बिजली संकट, जर्जर भवनों में मनेगा ‘प्रवेशोत्सव’

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कोरबा, 16 जून: छत्तीसगढ़ का शिक्षा विभाग एक तरफ नए शैक्षणिक सत्र के स्वागत और ‘शाला प्रवेशोत्सव’ के भव्य आयोजनों की तैयारियों में मशरूफ है, वहीं दूसरी ओर कोरबा जिले के सरकारी स्कूलों से आ रही जमीनी हकीकत इन दावों की हवा निकाल रही है। भीषण गर्मी और उमस के इस दौर में जिले के सैकड़ों बच्चे बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसने को मजबूर हैं।

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गर्मी में तपती कक्षाएं, न पंखा न बिजली

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, कोरबा जिले के 120 से अधिक स्कूलों में आज तक बिजली का कनेक्शन ही नहीं पहुंच पाया है। इसके अलावा, 400 से ज्यादा स्कूल ऐसे हैं जो अस्थायी (Temporary) बिजली कनेक्शन के सहारे जैसे-तैसे चल रहे हैं। पारा आसमान छू रहा है, लेकिन बिजली और पंखों के अभाव में नौनिहालों और शिक्षकों दोनों का हाल बेहाल है। अस्थायी कनेक्शनों की वजह से न सिर्फ पढ़ाई बाधित होती है, बल्कि शॉर्ट सर्किट और सुरक्षा का खतरा भी लगातार बना रहता है।

टीन और खपरैल की छतों के नीचे भविष्य

जिले में बुनियादी ढांचे की स्थिति बेहद चिंताजनक है। सैकड़ों बच्चे आज भी टीन और खपरैल की छतों वाले कमरों में बैठते हैं, जो गर्मी में भट्टी की तरह तपते हैं और बरसात में टपकते हैं।

जिले के स्कूलों का रिपोर्ट कार्ड:

  • प्राथमिक स्कूल: कुल 1,526 स्कूलों में से 521 को तत्काल मरम्मत की जरूरत है, जबकि 234 स्कूल टीन/खपरैल की छत वाले हैं।

  • मिडिल स्कूल: कुल 513 स्कूलों में से 156 भवन पूरी तरह जर्जर हो चुके हैं।

  • हाईस्कूल: कुल 293 स्कूलों में से 83 भवन मरम्मत योग्य हैं।

कागजों में शत-प्रतिशत नामांकन, जमीन पर ‘ड्रॉपआउट’ का पता नहीं

शाला प्रवेशोत्सव का मुख्य उद्देश्य हर बच्चे को स्कूल तक लाना है, लेकिन कोरबा में ‘ड्रॉपआउट’ (स्कूल छोड़ चुके) बच्चों का कोई स्पष्ट आंकड़ा ही मौजूद नहीं है। शाला त्यागी बच्चों की पहचान करने और उन्हें दोबारा मुख्यधारा से जोड़ने की प्रक्रिया कछुआ गति से चल रही है। नतीजा यह है कि आज भी ग्रामीण और शहरी इलाकों में कई बच्चे स्कूल जाने के बजाय मजदूरी और घरेलू कामों में उलझे हुए हैं।

बड़ा सवाल: उत्सव या सिर्फ औपचारिकता?

सत्र शुरू होने से पहले स्कूलों की इन मूलभूत समस्याओं को दूर न कर पाना प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अब देखना यह होगा कि शिक्षा विभाग केवल उत्सव मनाकर औपचारिकता पूरी करता है, या बच्चों को इस नारकीय स्थिति से बचाने के लिए कोई ठोस कदम उठाता है।

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